हाल ही
में जनगणना 2011 की भाषा
संबंधी आंकड़े जारी किए गए। इन आंकड़ों में जिस बात ने सबका ध्यान खींचा वह है
दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी का विस्तार। हिंदी को मातृभाषा कहने वालों की
संख्या में कुल 2.33% की
वृद्धि हुई है। इससे उन लोगों के मुंह पर ताले लग गए हैं जो कि हिंदी को पिछड़ती
हुई, सिकुड़ती
हुई या दबी कुचली भाषा मानते रहे हैं। हिंदी के भविष्य को लेकर तथाकथित तौर पर
चिंतित बुद्धिजीवियों को भी कुछ देर ए.सी. में जाकर चैन की सांस लेने का मौका मिला
है।
इस बीच
भारतीयों ने हिंदी को बिना किसी सरकारी प्रोत्साहन और राजनीतिक विरोध के स्वतः
स्फूर्त अपनी मातृभाषा अंगीकार कर लिया। जागरण जोश.कॉम में छपी खबर के अनुसार 1971 से 2011 के बीच
हिंदी 161 प्रतिशत
बढी है।1 हिंदी
अकेली भाषा नहीं है जिसमें वृद्धि देखी गयी है, मराठी भर तेलुगू को पीछे छोड़ भारत की तीसरी सर्वाधिक बड़ी मातृभाषा
बन गई है।2 संस्कृत को मातृभाषा मानने वालों की संख्या में
भी इजाफा हुआ है। कोंकणी और उर्दू का ग्राफ नीचे आया है।3
हिंदी के
विस्तार को लेकर जानकारों के अपने अपने तर्क हैं। मीडिया में इसे दो थ्येरी के
जरिए समझाया जा रहा है। एक, दक्षिणपंथी विचारधारा के राजनीति में प्रभावशाली
होना इसका कारण है।4 दूसरा, आर्थिक
केंद्रों का दक्षिण में खिसकना और दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित
होना ।
थोड़ी
गहनता से विवेचना करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि यह तर्क कितने सटीक है।
पहले
विवेचन में दक्षिणपंथी
विचारधारा के मजबूत होने की बात कही गई है परंतु जनगणना 2011 में शुरू
हुई और 2011 तक हुए
सामाजिक परिवर्तन को ही तथ्य रूप में प्रस्तुत करती है। 2014 तक
आते-आते डाटा संग्रहण का काम लगभग समाप्त हो जाता है। 2014 के बाद
केंद्रीय परिदृश्य में दक्षिणपंथी राजनीतिक ताकतें उभरती हैं। इसके अलावा प्रथम बार जनगणना में
डाटा संसाधन ICR ( Intelligent Character
Recognition) पद्धति द्वारा किया गया जो
एक पूर्णतः कंप्यूटरीकृत प्रक्रिया है।5 'मातृभाषा' के बारे में यह आंकड़े इतने
विलंब से आए यह जरूर चौंकाने वाली बात है, परंतु इसके लिए वर्तमान सरकार से अधिक हमारी सामाजिक वरियताओं में 'मातृभाषा' या 'भाषा' का स्थान अधिक उत्तरदायी
है। इस प्रकार आंकड़ों को स्वीकारने की बजाए प्रक्रिया को दोष देना कुछ-कुछ वैसा ही
है जैसे चुनाव परिणाम के लिए वोटिंग मशीन को कोसना।
दूसरा
दृष्टिकोण कुछ अधिक तार्किक लगता है परंतु समग्र विवेचन प्रस्तुत करने में कुछ कसर
छोड़ देता है| इस विश्लेषण में आर्थिक केंद्र दक्षिण भारत में चले जाने की बात
मानी गई|6 साथ ही जनसंख्या वृद्धि दर में इसके कारण तलाशे गए हैं| यहाँ प्रश्न
है कि आर्थिक केंद्र से तात्पर्य क्या बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई जैसे शहरों से
ही है| इनके बरक्स विकसित हुए गुड़गांव और नोएडा को आर्थिक केंद्र क्यों नहीं माना
जाना चाहिए? स्थिति और अधिक स्पष्ट हो पाती यदि हमें पता चल पाता कि नोएडा और
गुड़गांव में कितने लोगों ने दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखी और दक्षिण राज्यों के उक्त
महानगरों में कितने लोग व्यापार के लिए टूटी-फूटी हिंदी सीखें| यह आंकड़ा भले ही
हमारे पास नहीं है परंतु एक बात स्पष्ट है कि भारत में कहीं भी भिन्न भाषा-भाषी
लोग मिलते हैं तो आमतौर पर संपर्क भाषा हिंदी ही होती है इस तरह हिंदी न जानने
वालों पर हिंदी में बोलने या हिंदी सीखने का एक समाजिक दबाव स्वत: ही आ जाता है|
जनांकिकी (Demography) में
परिवर्तन मातृभाषा में परिवर्तन का एक बड़ा कारण है इसे नकारा नहीं जा सकता परंतु
हिंदी विस्तार के पूरे विमर्श को भाषा की मूल प्रवृति से अनिभिज्ञ होकर देखना स्वयं को अंधेरे
में रखना होगा|
सिद्धांतत:
बात बोझिल न बन जाए इसलिए उपमा से समझना श्रेयस्कर है| भाषा के जीवनकाल में हिंदी के लिए यह तरुणाई है
अभी उसे युवा होना है| वर्तमान परिवेश में वैश्विक स्तर पर भाषाओं की स्थिति को
देखें तो हम पाएंगे कि बड़ी भाषाओं का दबाव छोटी भाषाओं पर निरंतर बढ़ रहा है| इससे
भाषाई विविधता बुरी तरह प्रभावित हो रही है| यह समान्यतः डार्विन के सिद्धांत की
तरह है – संघर्ष में जीतेने वाला ही शेष बचा रह जाएगा| चूंकि भाषा महज़ अभिव्यक्ति
का साधन नहीं है अपितु संस्कृति की संवाहिका भी है इसलिए दुर्लभ और संकटग्रस्त भाषाओं
की रक्षा करना सभी का दायित्व हो जाता है| इस बीच बहुत चिंताजनक तथ्य यह है कि
भाषाई विविधता सूची में भारत का स्थान 2009 में नौवें स्थान से लुढ़क कर 2017 में चौदवे
स्थान पर पहुंच गया है|7 जनजातीय भाषाएं तेजी से
समाप्त हो रही हैं और बहुसंख्यक समाज इससे निश्चिंत है| नीति निर्धारक धारक मुंह
फेरे खड़े हैं| भारत में ही नहीं कमोवेश पूरे विश्व में संकटग्रस्त भाषाओं का दायरा
तेजी से बढ़ा है और लगभग समूचे विश्व में बहुसंख्यक समाज और नीति निर्धारक इसकी
गम्भीरता से अछूते हैं|
बहारल हमें याद रहे कि आज से 70-80 साल पहले कुछ लोग हिंदी और उर्दू को लेकर लड़ रहे थे। उन्हें स्थापित करने का प्रश्न वर्चस्व का प्रश्न मान रहे थे। कुछ 40 साल पहले हमारे तमिल साथी हिंदी को अपना बैरी मान रहे थे। आज समय ने सिद्ध कर दिया कि दीर्घकालिक रूप से भाषा आंदोलनों और राजनीतिक कारणों से नहीं बदलती। भाषा समाज की संपत्ति है। समाज भाषा को जिधर मर्जी ले जा सकता है। भाषा पर समाज का एकाधिकार है।
1. https://m.jagranjosh.com/current-affairs/language-census-2011-surge-in-hindi-speakers-south-indian-language-and-urdu-speakers-decline-1530869001-1
Dt.6july 2018
2.https://m.navbharattimes.indiatimes.com/state/otherstates/bangalore/chennai/according-to-language-data-of-2011-census-hindi-bangla-odia-speaking-increases-in-south-india/-/articleshow/64773099.cms
दि.28.जून 20018
3. See 1 Above.
4. https://www.livemint.com/Politics/D6pwgtFdtBmhOUJoGNA3sL/What-census-data-on-languages-shows-about-migration-in-India.htm
Dt. July 5 2018
5.https://blog.socialcops.com/intelligence/data-stories/step-step-guide-2011-census-successes-faliure-questions/
Dt. July 5 2018
5.https://blog.socialcops.com/intelligence/data-stories/step-step-guide-2011-census-successes-faliure-questions/
6. See 2. Above
7. See 2. Above
8. See
1 Above for Source of Statement 4 & 6.

