Monday, 29 February 2016

निरर्थक जिज्ञासा

ग़ालिब इस दौर में होते तो कहते कि ‘हजारों सूचनाएं ऐसी कि हर सूचना पर दम निकले’| सूचना प्रोद्दौगिकी का यह दौर सूचनाओं के विस्फोट का दौर है| हर और सूचनाओं का ढेर है, यहाँ तक कि अपके-मेरे घर में, दफ्तर में, कार में, बस में, सड़क पर, पार्क में, हर और सूचनाएं बिखरी पड़ी हैं| वो दिन गए जब हथेली में भविष्य की रेखाएं हुआ करती थी अब मुठ्ठी में दुनिया है। जिसको जैसी, जितनी जब जो सूचना चाहिए तब वो वैसी और उतनी (नहीं उससे बहुत ज्यादा) सूचना ले सकता है| आज जब शिक्षा की सार्थकता इस बात से आंकी जाने लगी है कि नया ज्ञान हासिल कर उसका सर्वोत्कृष्ट प्रयोग करना है तब यह बहस आवश्यक हो जाती है कि ‘आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जाना है’ या ‘प्रयोगानुसार आवशयकता का सर्जन किया जाना है’|

दरअसल बात ये है कि आपको क्या कितना और क्यों जानना है इन सवालों से दो-चार हुए बिना ‘प्रयोग’ उपयोगिता में नहीं बदल सकता| उपयोगिता के बिना प्रयोग आवश्यकता नहीं होता| हो यह रहा है कि आवश्यकता का पता न हो पर चलन के अनुसार चलने के लिए प्रयोग अधिक हो रहा है| थोड़ी देर के लिए सोचे कि वाह्ट्स ऐप, फेसबुक, इंटरनेट आदि की आवश्यकता कितनी है| जीवन का बहुत-सा बहुमूल्य समय ऐसे ही नष्ट हो जाता है| नेट खोला, देखना कुछ था, देखा कुछ और| जो देखा वो अनुपयोगी था, जो जाना वो शायद ही कभी काम आये| विडम्बना यह है कि हम सब कुछ जान लेना चाहते हैं सब कुछ समझ लेना चाहते हैं लेकिन इस जानकारी और समझ का करना क्या है यह समझ नहीं आता |

बचपन से दिमाग में भर दिया गया है कि सीखा हुआ बेकार नहीं जाता। जबकि कभी- कभी हमे लगता है कि मैं वो तो कर ही नहीं रहा जो मुझे सिखाया गया था। सोच कर देखिये  जो बच्चे क्लास में आपसे कम नम्बर लाते थे क्या वो सारे आपसे कमतर जीवन जी रहे हैं? स्कूल और कॉलेज में जो सीखा था उसका कितना प्रतिशत आप अपने दैनिक कार्यों (दफ्तर या घर) में प्रयोग करते हैं। मित्रों जब ज्ञान व्यवहार से बाहर हो जाता है तो धीरे- धीरे दिमाग से भी बाहर् हो जाता है। अडल्स हकस्ले का एक निबन्ध है ‘ In Defence of Ignorance’ (अब ख़ामखां उसे गूगल मत करने बैठ जाना)। इसमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि हम अपने बारे में कितना कम जानते हैं परंतु इससे हमारी जिन्दगी पर कुछ खास असर नहीं पड़ता। भूली-बिसरी सी एक कथात्मक कविता की याद आ रही है। इसमें शिक्षित और गरीब नायक अपनी अनपढ़ और गंवारु माँ के लाइलाज हो चुके कैंसर की बात को अपने तक ही रखता है। माँ को कैंसर की भयावहता से डरकर भी जीना है और उसे साधारण ज्वर मानकर भी। इसलिये नायक निर्णय लेता है कि अनिभिज्ञता माँ के लिये अरामदायक है।

मित्रों ! मध्य-पूर्व एशिया के संकट में अमेरिका की क्या भूमिका है या बजट में राजस्व घाटे को कम करने के लिए सरकार क्या उपाय कर रही है, इन बातों को जानकर आपके निजी जीवन की शायद ही कोई समस्या हल हो। पर लगता है कि जानना जरूरी है!!! क्यों? पता नहीं......! अलसुबह मर्निंग वॉक पर उम्रदराज पुरुष देश के हालात पर चर्चा ऐसे करते हैं कि प्राइम टाइम के न्यूज़ एंकर भी शर्मा जायें। बाद में यह भी जरूर कहते हैं ‘अजी उम्र हो गयी ये देखते-देखते। खैर जाने दो ... हमे क्या...?’

दुनिया बहुत बड़ी है मित्रों। हमारे पास समय सीमित है और जानकारियाँ या सूचना असीमित हैं। सोचने की बात ये है कि आवशयक क्या है – समय का बेहतर प्रयोग या गैर-जरूरी सूचनायें।

थोड़े को बहुत समझें। बात नहीं समझ में आयी तो न समझें।