Friday, 30 December 2016

नोटबंदी के मौसम में लाइन की बीमारी

इन दिनों नई बीमारी चली है| बीमारी के कारणों का पता नहीं लग रहा है परन्तु लोग मरते हुए दिख रहे हैं|  लक्षण के रूप में इतना ही समझ आ रहा है कि आदमी कुछ देर खड़ा रहता है फिर अचानक सीने में हुए दर्द से या बी.पी. बढने या घटने से या चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ता है और ईश्वर को प्यारा हो जाता है| माइकबाजों ने इस बीमारी को ‘लाइन में मौत’ का नाम दिया है| मजे की बात यह है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसे हार्ट अटैक, हाइपरटेंशन लिखकर अपने कर्तव्य को पूर्ण मान लिया जाता है और ‘लाइन’ नामक असली बीमारी का कहीं जिक्र भी नहीं किया जाता| माइकबाजों की पूरी कोशिश है कि इस बीमारी को महामारी घोषित किया जाए पर सरकार ने इस मर्ज़ से पीड़ित लोगों को अघोषित रूप से ‘हवन में समिधा’ का दर्जा दिया है और प्रत्यक्ष रूप से इन्हें भूल जाने का प्रयास किया है|
पर आज सरकार से नहीं हमारे माइकबाज बुद्धिजीवियों से है। तो मेरे प्यारे माइकबाज़ों यह समझाने का प्रयास करो कि बीमारी से मृत्यु होने पर ‘स्थान’ विशेष का योगदान कितना अधिक होता है या एटीएम की क्या भूमिका है क्योंकि अधिकतर मामलों में रोगी का मुंह एटीएम की ओर था और वह उससे केवल 200-300 मीटर की दूरी पर खड़ा था| चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों से या गूगल देवता से पूछकर इस देश के आम जन का ज्ञानवर्धन करो कि किसी को जान से मारने के लिए ‘लाइन’ कितनी घातक सिद्ध हो सकती है और एटीएम से किस प्रकार की जानलेवा किरणें निकलती हैं| हमारे देश के पर्यावरण और परिवेश का अध्ययन कर यह भी सिद्ध किया जाना चाहिए कि परम्परागत रूप से पृथ्वी के इस भूभाग पर लोग ‘लाइन’ नामक संक्रामक रोग से बहुत बचते थे| हमारे समाज में ‘लाइन’ में लगने वाले की ‘पहुँच’ प्रतिरोधक क्षमता निम्नस्तरीय मानी जाती है| यहाँ तक कि ‘लाइन’ के रोग से पीड़ित लोगों को समाज भी हेय दृष्टी से देखता रहा है| परन्तु एकाएक नवंबर माह में चली ठंडी हवा से जो किटाणु फैले उनके कारण जिनको कभी धूप ने भी सीधे न छुआ था उनको ‘लाइन’ ने छू दिया| ‘लाइन’ से तकलीफ इतनी बढ़ गयी कि लोग सड़क पर लहूलुहान नज़र आने लगे| माइक मिलने पर चश्मदीदों ने बताया कि ‘साहब ‘लाइन’ में लगाने से पहले ये बंदा मिल्खा सिंह की तरह था एक घंटे बाद ही यह काश्तो मुखर्जी हो गया|’ इतनी घातक बीमारी है ‘लाइन’| अगर इस ‘लाइन’ का कलेष न होता तो अभी सौ साल और जीता हमारा प्यारा मिट्टी का माधो| 
हमारे बाप-दादे भी कभी बस या ट्रेन में चढने के लिए ‘लाइन’ में नहीं लगे| फिल्म के लिए टिकट की बात हो या बिजली का बिल जमा कराने की ‘धक्का मार आगे बढ़’ के अचूक सिद्धांत पर चलकर ही हम आगे बढ़े| हम कभी लगे भी तो वोट डालने के लिए ही ‘लाइन’ में लगे तब भी बल्लियों के सहारे| हाय री किस्मत! अरे ऊपर वाले! यह दिन दिखाना ही था तो पहले कुछ हिंट तो दे देता| खैर जाने वाले को कौन रोक सकता है| वो तो भला हो इन माइकबाजों का कि इन्हें गिनती आती थी सो समय पर काम आ गयी| मौसम बदलने पर गिनती बहुत काम आती है| मौसम का कुछ पता नहीं कब बदल जाए| कभी गड्ढे में गिरने का मौसम होता है तो कभी दुष्कर्म का कभी मिलावटखोरों को सजा दिलाने का मौसम होता है तो कभी ऑनर किलिंग का| हर बदलते मौसम में हमारे माइकबाज मित्र ही हमे बताते हैं कि यह पांचवी, पन्द्रवी या पच्चीसवी घटना है|ये| इनके लिए एक मौसम में दूसरे मौसम के बारे में बात करना ऐसा ही बेतुका है जैसा गर्मियों में गर्म कपड़े पहनना। वास्तव में अगर ये न होते तो हमें कौन बताता कि हम किस पीड़ा को सहन कर रहे हैं।
बस इन माइकबाज मित्रों से इतना ही निवेदन है कि मौसम बदलते रहे पर तुम न बदलना| बस हाथ में माइक लिए और कैमरे की तरफ देखते हुए भागती हुई भैंस के पीछे भागते रहना, भागते रहना.......

Wednesday, 23 November 2016

नोटबंदी : हड़बड़ी में चलाया गया ब्रह्मास्त्र

भारत सरकार के इस सहासिक फैसले की जितनी प्रशंसा की जाए कम है| फैसले से ज्यादा प्रशंसा उस साहस की कि जानी चाहिए जिसने तत्कालिक कष्टों ओर हो-हल्ले की परवाह किये बिना देश की 86% मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया|
लेकिन प्रश्न ये है कि इस घोषणा के लिए समय का चुनाव किस आधार किया गया और  बैंकिंग क्षेत्र की ढांचागत स्थितियों को, मुद्रा छपाई की व्यवस्था के लिए क्या होमवर्क किया गया था| प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार लम्बे समय से इसकी तैयारी कर रही थी और इस दिशा में बढ़ रही थी परन्तु ये लम्बी छलांग लगाने की जल्दबाजी का कारण समझ से परे है| लंबी छलांग इसलिए क्योंकि इस छलांग से दो पग बाधाओं को एक साथ लांघने का प्रयास किया गया है| एक तो वह नगद जो आम-जन के पास किसी भी रूप में था और दूसरा वो बेहिसाब धन जो धन कुबेरों ने स्टॉक किया हुआ था| ‘धनकुबेर’ की परिभाषा आम जन के लिए उतनी ही अस्पष्ट है जितनी ‘कालेधन’ की थी| तथाकथित ‘कालेधन’ के बारे में किसी ने नहीं सोचा था कि आटे के कनस्तर में रखे नोट या शगुन के लिफ़ाफ़े में दी गयी नगदी रातोंरात कालाधन बन जायेगी| इसी तरह जिन धन्ना सेठों की नींद उड़ने के उत्सव मनाये जा रहे हैं उनकी छवि भी काल्पनिक अधिक है| यथार्थ के धरातल पर जब हमें पता लगता है कि यह धन्ना सेठ कोई और नहीं वह परचूनिया है जिसने राममोहन को उधार देना बंद कर दिया है या वो सेठ जी हैं जो कल तक करोड़ों के मालिक लगते थे आज कह रहे हैं कि कल्लू तुझे देने के लिए सौ-सौ के नोट नहीं है तो महीने भर गाँव चला जा तब हमे लगता है कि ठगा तो वो राम मोहन और कल्लू गए हैं| धन्ना सेठ कतार में नहीं हैं| उनके लिए कल्लू के किसी पड़ोसी को बुला लिया गया है जो मजदूरी कतार में लगने की मजदूरी ले रहा है|
कालेधन के मुद्दे पर वर्तमान सरकार ने अबतक जो कदम उठाये थे वे बहुत प्रभावशाली परिणाम देने वाले नहीं रहे| यह कदम एक मास्टर स्ट्रोक था| नोटबंदी के बाद लगा कि इस दिशा में उठाये गए पूर्ववर्ती कदम इसकी भूमिका के लिए ही थे| नोटबंदी करने से पूर्व भारत सरकार ने कुछ समस्याओं का पुर्वानुमान लगा लिया होगा परन्तु बहुत अधिक प्रबंधन के बिना ‘देखा जाएगा’ वाले रवैये से काम किया गया| नि:संदेह गोपनीयता का एक ख़तरा था परन्तु भारत जैसे बड़े देश में 86% मुद्रा को बंद कर देने के लिए जिन बुनियादी चुनौतियों से निपटा जाना था उनके बारे में सरकार कोई ठोस रणनीति नहीं बना सकी| नोटबंदी केवल 500 और 1000 के नोट का बंद होना ही नहीं है यह विश्व की एक बटा सात आबादी को नगद रहित व्यापार की और धकेलने का और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को  बैंक की नकेल पहनाने का भागरथी प्रयास भी है|
यह भाजपा की रणनीतिक जीत ही कही जायेगी कि नोटबंदी के खिलाफ सीधे-सीधे बोलने से विपक्षी पार्टियां भी बच रही हैं| विपक्षी नेता शादियों और लोगों की तकलीफ की दुहाई दे रहें हैं| इस सब के बीच जो बात समझ से परे है वह यह कि यदि सरकार को यह कदम उठाना था और लंबे समय से इस दिशा में कदम बढाये जा रहे थे तो कम से कम छोटे दुकानदारों की भलाई के लिए ‘नकद रहित व्यापार’ को प्रोत्साहित करने के लिए एक लंबा अभियान चलाया जा सकता था, जैसे जनधन के लिए किया गया| इससे छोटे व्यापारी के नुकसान को कम किया जा सकता था| प्रति शाखा नागरिकों के अनुपात को बेहतर किया जाना चाहिए था जो विकसित राष्ट्रों से बहुत कम है| किसानों के लिए बुआई का समय था और अधिकतर किसान नगद में ही लेन-देन करते हैं उन्हें नगद रहित व्यापार में प्रोत्साहित करने के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गयी| बड़े संस्थानों जैसे अस्पताल, स्कूल-कॉलेजों, धार्मिक ट्रस्ट आदि के लिए किसी भी प्रकार के नगद लेनदेन को पूर्णत: बैन किया जा सकता था| यह सब करने में कुछ समय लगता परन्तु कम से कम इस सरकार के पास समय और बहुमत का उतना अभाव नहीं था इसलिए इस ब्रह्मास्त्र को चलाने में जल्दबाजी दिखाने के कारण अप्रत्यक्ष अधिक लगते हैं|
यदि आदमी को अपने ही खाते में जमा किया धन आवश्यकता के समय नहीं मिलेगा तो आम आदमी अधिक इंतज़ार नहीं कर सकेगा और अराजकता बढ़ने का खतरा बढ़ता जाएगा| पता नहीं हमारे बैंककर्मी और बैंकिंग सिस्टम इस चुनौती के लिए कितना तैयार है लेकिन एक बात तय है कि यह परीक्षा उनसे ज्यादा उस आम जन की है जिससे प्रधानमंत्री ने 50 दिन का सहयोग माँगा है|              
 

Sunday, 10 July 2016

PEACE वाले बाबा जी


      
हमारे पीस वाले बाबा जी मज़हब को रिसर्च का विषय मानकर उसमें से साइंटिफिक बातें  और  जज़्बातों को अलग करते हैंकोशिश होती है कि लोग मज़हब को समझ कर उस पर अमल करें| पर मियां लोग ऐसे नामुराद हैं कि वही पकड़ते हैं जो पकड़ना चाहते हैं| अब अगर कहा जाए कि लादेन की तरह बनो तो उसका मतलब ये थोड़े है कि आतंकवादी बनो उसके मायने तो होंगे अपने अंदर इतनी कुवत्त पैदा करो कि अमेरिका जैसा मुल्क भी तुमसे डरने लगे| अब मान लो कि अमेरिका की जगह कोई चीन (पाकिस्तान और बंगलादेश तो हमारी अपनी औलाद ठहरे) के ऊपर बम गिराने वाला आ जाए तो क्या वो हमें प्यारा न होगा| ये तो नू कही थी कि लोग दुश्मन मुल्क को धमकाने-डराने के लिए आगे बढ़ेंगे| मान लो चीन को डराने के लिए इस देश से एक लादेन हो जाता तो क्या इस दुनिया में पीस न बढ़ती| ऊपरवाला बड़ा गर्क करे इन मीडिया वालों का मजहबपरस्त और वतन परस्त लोगों का नाम खराब करती है| अजी! तहरीर करने वाला जोरदार हो तो कौन प्रभावित नहीं होता| दोचार नौजवानों में जोश आ गया तो हमारा कसूर है क्या? अरे लौंडों को आ गया जोश तो कर बैठे नादानी| अमां यार! कोई हमारी मीठी बोली को छोड़कर सीधे दिल की आवाज़ सुन ले तो ये उसकी काबलियत है या हमारी शरारत| जनाब इस बार तो सेकुलरलोगों ने भी साथ छोड़ दिया| उन पर तोहमत क्यों लगाएं हमारे तो अपने ही कहते हैं कि पीस वाले अशांति फैला रिये हैं|  चलती हुई दुकनदारी देखी नहीं जाती किसी से| हमें कट्टर बता रिये हैं| मैं कहता हूँ हमें कट्टर बताने वाला है कट्टर| खुदा दोज़ख़ में डालेगा हमें कट्टर बताने वालों को ........

कट्टर कट्टर सब करें कट्टर  बुझे न कोय |  
जो खुद की कट्टरता देखे कट्टर काहे होय ||

 


 


Monday, 29 February 2016

निरर्थक जिज्ञासा

ग़ालिब इस दौर में होते तो कहते कि ‘हजारों सूचनाएं ऐसी कि हर सूचना पर दम निकले’| सूचना प्रोद्दौगिकी का यह दौर सूचनाओं के विस्फोट का दौर है| हर और सूचनाओं का ढेर है, यहाँ तक कि अपके-मेरे घर में, दफ्तर में, कार में, बस में, सड़क पर, पार्क में, हर और सूचनाएं बिखरी पड़ी हैं| वो दिन गए जब हथेली में भविष्य की रेखाएं हुआ करती थी अब मुठ्ठी में दुनिया है। जिसको जैसी, जितनी जब जो सूचना चाहिए तब वो वैसी और उतनी (नहीं उससे बहुत ज्यादा) सूचना ले सकता है| आज जब शिक्षा की सार्थकता इस बात से आंकी जाने लगी है कि नया ज्ञान हासिल कर उसका सर्वोत्कृष्ट प्रयोग करना है तब यह बहस आवश्यक हो जाती है कि ‘आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जाना है’ या ‘प्रयोगानुसार आवशयकता का सर्जन किया जाना है’|

दरअसल बात ये है कि आपको क्या कितना और क्यों जानना है इन सवालों से दो-चार हुए बिना ‘प्रयोग’ उपयोगिता में नहीं बदल सकता| उपयोगिता के बिना प्रयोग आवश्यकता नहीं होता| हो यह रहा है कि आवश्यकता का पता न हो पर चलन के अनुसार चलने के लिए प्रयोग अधिक हो रहा है| थोड़ी देर के लिए सोचे कि वाह्ट्स ऐप, फेसबुक, इंटरनेट आदि की आवश्यकता कितनी है| जीवन का बहुत-सा बहुमूल्य समय ऐसे ही नष्ट हो जाता है| नेट खोला, देखना कुछ था, देखा कुछ और| जो देखा वो अनुपयोगी था, जो जाना वो शायद ही कभी काम आये| विडम्बना यह है कि हम सब कुछ जान लेना चाहते हैं सब कुछ समझ लेना चाहते हैं लेकिन इस जानकारी और समझ का करना क्या है यह समझ नहीं आता |

बचपन से दिमाग में भर दिया गया है कि सीखा हुआ बेकार नहीं जाता। जबकि कभी- कभी हमे लगता है कि मैं वो तो कर ही नहीं रहा जो मुझे सिखाया गया था। सोच कर देखिये  जो बच्चे क्लास में आपसे कम नम्बर लाते थे क्या वो सारे आपसे कमतर जीवन जी रहे हैं? स्कूल और कॉलेज में जो सीखा था उसका कितना प्रतिशत आप अपने दैनिक कार्यों (दफ्तर या घर) में प्रयोग करते हैं। मित्रों जब ज्ञान व्यवहार से बाहर हो जाता है तो धीरे- धीरे दिमाग से भी बाहर् हो जाता है। अडल्स हकस्ले का एक निबन्ध है ‘ In Defence of Ignorance’ (अब ख़ामखां उसे गूगल मत करने बैठ जाना)। इसमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि हम अपने बारे में कितना कम जानते हैं परंतु इससे हमारी जिन्दगी पर कुछ खास असर नहीं पड़ता। भूली-बिसरी सी एक कथात्मक कविता की याद आ रही है। इसमें शिक्षित और गरीब नायक अपनी अनपढ़ और गंवारु माँ के लाइलाज हो चुके कैंसर की बात को अपने तक ही रखता है। माँ को कैंसर की भयावहता से डरकर भी जीना है और उसे साधारण ज्वर मानकर भी। इसलिये नायक निर्णय लेता है कि अनिभिज्ञता माँ के लिये अरामदायक है।

मित्रों ! मध्य-पूर्व एशिया के संकट में अमेरिका की क्या भूमिका है या बजट में राजस्व घाटे को कम करने के लिए सरकार क्या उपाय कर रही है, इन बातों को जानकर आपके निजी जीवन की शायद ही कोई समस्या हल हो। पर लगता है कि जानना जरूरी है!!! क्यों? पता नहीं......! अलसुबह मर्निंग वॉक पर उम्रदराज पुरुष देश के हालात पर चर्चा ऐसे करते हैं कि प्राइम टाइम के न्यूज़ एंकर भी शर्मा जायें। बाद में यह भी जरूर कहते हैं ‘अजी उम्र हो गयी ये देखते-देखते। खैर जाने दो ... हमे क्या...?’

दुनिया बहुत बड़ी है मित्रों। हमारे पास समय सीमित है और जानकारियाँ या सूचना असीमित हैं। सोचने की बात ये है कि आवशयक क्या है – समय का बेहतर प्रयोग या गैर-जरूरी सूचनायें।

थोड़े को बहुत समझें। बात नहीं समझ में आयी तो न समझें।