Tuesday, 16 June 2020

भाषा का जीवन



मनुष्यों की तरह भाषा का भी एक जीवन होता है। भाषा भी जन्म लेती है, बड़ी होती है, युवा होती है। प्रौढ़ावस्था से होती हुई क्षीणकाय और दुर्बल होकर अपने अवसान तक पहुँचती है। प्रकट रूप से देखने पर ऐसा कहना मुश्किल लग सकता है  कि भाषा कौन-सी अवस्था में है परंतु भाषा के इतिहास, भूगोल, शब्दकोष, बोलने वालों की संख्या, साहित्य, साहित्येतर विषयों में भाषा का योगदान ऐसे उपादान हैं जिससे भाषा के जीवनकाल में चल रहे पड़ाव की पड़ताल करने में सहायता मिल सकती है।

हाल ही में भारत सरकार द्वारा कराये गये वृहद शोध से यह बात सामने आयी है कि भारत में 780 से अधिक भाषायें बोली जाती हैं और लगभग 66 लिपि प्रचलन में हैं।* जितना कठिन यह बताना है कि इन भाषाओं का जन्म कब हुआ होगा उतना ही दिलचस्प है यह समझना है कि इन भाषाओं की सेहत आज कैसी है और भविष्य के खतरों से निपटने के लिये वे कितनी तैयार हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस सर्वेक्षण में अरुणाचल प्रदेश को भाषिक विविधता के लिहाज से सर्वाधिक संपन्न प्रदेश पाया गया। साथ ही प्रति व्यक्ति भाषायी सघनता की बात करें तो पूर्वोत्तर भारत विश्व भर में भाषायी विविधता के सर्वाधिक संपन्न क्षेत्र की तरह उभरकर हमारे सामने आता है। इसका कारण है इस क्षेत्र में सालों से फलती-फूलती आयी अलग-अलग जनजातियाँ। इन भाषाओं के विकास के लिये क्या किया जा सकता है इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये। योगेन्द्र यादव के शब्दों में ‘भाषाओं का जो संघर्ष है वह सिर्फ सामाजिक आर्थिक बराबरी का संघर्ष नहीं है, यह मानव सभ्यता को बचाने का संघर्ष भी है|’^
मल्टी ब्रांड स्टोर में टंगी जैकट
 पर हिन्दी में लिखा 'डिस्क्लेमर'


प्रश्न यह है कि व्यवाहारिक तौर पर किस स्तर तक जाकर भाषा को संरक्षित किया जा सकता है। वह भी तब जब इनमें से अधिकतर भाषाओं को बोलने वालों की संख्या महज़ कुछ सैकड़ों में है। आदिवासी समाज की वर्तमान परिस्थितियों में यह और भी दुष्कर है क्योंकि इस समाज के सामने मुख्यधारा में मिलकर रोज़गार पाना, विस्थापन से बचना अथवा विस्थापन के संघर्षों से टकराकर अपनी भावी पीढ़ी को स्वावलंबी बनाना अधिक बड़ी चुनौतियाँ हैं। इस तनाव और दबाव के वातावरण में क्या कोई जाति या उसके वंशज अपनी भाषा को बचाये रखने के लिए क्या और कितना कुर्बान कर पायेगा|  अलास्का में कुछ यूपिक एस्कीमो समुदायों की भाषा 20 वर्षों में ही बूढ़ी पड़ गयी चूँकि वहाँ बच्चों ने अपनी पारंपरिक भाषा की जगह अंग्रेज़ी को चुना और सीखा।°

डॉ डवे के अनुसार ‘भाषा के लुप्त होने के लिये उसका छोटा होना आवश्यक नहीं है। यह भाषा की प्रकृति पर निर्भर करता है’।★
इस प्रकृति को समझने से बहुत कुछ स्पष्ट हो सकता है। यहां डवे लेटिन, ग्रीक और संस्कृत का उदहारण देते हैं। संस्कृत अपने विस्तृत और कठोर व्याकरण तथा द्विजों के एकाधिकार के कारण लोकव्यवहार से परे खिसक गयी। 

भाषाओं के विलुप्त हो जाने या प्रचलन से बाहर हो जाने के अनेक कारण हो सकते हैं। यह भी निश्चित है कि ऐसा रातों-रात नहीं होता पर इस प्रक्रिया में शताब्दियाँ लगे यह भी आवश्यक नहीं है।  ‘भाखा बहता नीर’ को वेद-वाक्य मानकर बस यह ध्यान देना आवश्यक है कि भाषा किस समय कितने कोण पर और किस रूप में और क्यों अपने प्रयोक्ता से दूर जा रही है। 

*डॉ डवे के आधीन 2011 से 2013 तक हुआ लिंगुइस्ट सर्वे ऑफ इंडिया 
^पृ-41, भाषा की राजनीति और राष्ट्रीय अस्मिता सं. ज्ञानतोष झा 
°Linguist Society of America. What is an Endangered Language- Anthony C. Woodburg
★blogs.reuters.com को दिया साक्षात्कार 

Friday, 20 March 2020

ये 'Quarantine' क्या होता है


ये 'Quarantine' क्या होता है ? शोले फिल्म में ऐसा ही एक संवाद था| एक हफ्ता पहले कितने ही 'देहातियों' ने मुझसे उसी शैली में ये सवाल किया| 😊




Quarantine (क्वारंटीन/क्वारंटाइन) शब्द बार-बार प्रयोग हो रहा है| कोरोना का प्रसंग हो तो मीडिया के अंग्रेजी और हिन्दी, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक सभी हलकों में इस शब्द की धूम है| Oxford Dictionary के अनुसार इसका शाब्दिक अर्थ है ‘a period of time when an animal or a person that has or may have a disease is kept away from others to prevent the disease from spreading.’ इस शब्द की उत्पत्ति इटली भाषा के Quarantina से मानी गयी है जिसका अर्थ है ‘चालीस दिन’ या Quaranta  अर्थात चालीस| जिस सन्दर्भ में इसका प्रयोग किया जा रहा है उसमें इससे सटीक शब्द नहीं हो सकता| शब्द ‘Isolation’ भी देखने को मिला लेकिन इसमें ‘अलग होने’ या ‘एकाकीपन’ का भाव है परन्तु उसका कारण बीमारी है ऐसा नहीं स्पष्ट होता| हिन्दी में इसके लिए क्या शब्द प्रयोग किया जाए| शब्दकोष में इसके लिए ‘संघरोध’ शब्द का प्रयोग है| आप कहेंगे इसे कौन समझ पाता| पर पहली बार सुनकर ‘क्वारंटीन’ कितने लोग समझ पाए थे? ‘संघ’ और ‘रोध’ से मिलकर बना ये शब्द क्या आम भारतीय के लिए समझना बहुत कठिन है| सभी जानते हैं कि ‘संघ’ से तात्पर्य ‘संगठन’, ‘समूह’ से हैं जबकि ‘रोध’ प्रत्यय वाले प्रतिरोध और  गतिरोध मीडिया में पहले से ही प्रचलित हैं| प्रिंट मीडिया वाले के लिए भी ‘क्वारंटीन’ से अधिक उपयुक्त ‘संघरोध’ होता क्योंकि यह कम जगह घेरता| फिर ‘क्वारंटीन’ शब्द के प्रयोग के पीछे क्या कारण हो सकता है?

मीडिया में बहुत-सी बार ऐसी स्थिति आती है कि समाचार इतनी तेजी से आता है कि समाचार चलाना प्राथमिकता होती है उसके लिए जो भी ‘प्रचलित’ शब्द मिले, प्रयोग कर लिया जाता है| यहाँ ‘प्रचलन’ पद विचारणीय है| ‘प्रचलन’ की प्रक्रिया को कौन समझ रहा है? कैसे समझ रहा है? इसके केंद्र में पाठक/श्रोता है या पत्रकार/संपादक का निजी व्यवहारिक अनुभव| अनुभवी संपादक समाचार की बारम्बारता (फ्रीक्वेंसी) और उसकी ‘महत्ता’ के आधार पर उसकी शब्दावली में आवश्यक परिवर्तन कर सकते अथवा करते हैं|

तो क्या दूसरी भाषा के शब्दों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए? बिलकुल किया जाना चाहिए| ऐसे शब्दों को जो लोक में रच-बस चुके हैं (जैसे सीलिंग, मार्केट) या ऐसे शब्दों को जो नये विषय से जुड़े हैं और पारिभाषिक है लेकिन ऐसे शब्द जिनके रूपांतरण मौजूद हैं और सर्वसुलभ हैं उन शब्दों को भी प्रयोग न करने का क्या कारण हो सकता है? आखिर किस आधार पर यह आंकलन किया जा रहा है कि ‘क्वारंटीन’ आमजन को समझ में आएगा और ‘संगरोध’ नहीं आएगा| ऐसा भी नहीं दिखा कि किसी भारतीय भाषा का कोई अन्य शब्द (‘एकांतवास’ सरीखा) को उन सन्दर्भों में प्रयोग करने का कोई प्रयास किया गया हो? कुछ समय पहले मैंने इण्डिया टीवी के रजत शर्मा को हिन्दी समाचार पढ़ते हुए ‘ब्रीच’ शब्द का प्रयोग करते हुए सुना| ये सुरक्षा में ‘ब्रीच’ का मामला था| क्या इसके लिए ‘सेंध’ प्रचलित शब्द नहीं है? यहाँ विषय  फिल्मी न्यूज़ या शेयर बाजार का नहीं है जहां कुछ छूट अपेक्षित मानी जा सकती है| ‘सर्वाधिक पढ़ा जाने’ का दावा करने वाले हिन्दी दैनिक अखबार आज ‘आइसोलेट’ और ‘क्वारंटीन’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं| 

कोई भी शब्द उठाकर जनता के मुंह पर दे मारिये क्योंकि आपके पास मीडिया की ताकत है और जनता की भाषा में गढ़े शब्दों की शक्ल आपको पसंद नहीं| ये आमजन के ऊपर अंग्रेजी थोपना नहीं तो क्या है| कोई समझाये कि इसे मीडिया के द्वारा अपने दायित्व की अनदेखी क्यों न समझा जाए|