Thursday, 20 December 2018

हिन्दी से दूर भागते हिन्दी वाले


भाषा का प्राण तत्व है उसके प्रयोक्ता से उसका जुड़ाव| इस जुड़ाव को भाषाई कट्टरता समझने की चूक हो सकती है परन्तु इस जुड़ाव के बिना भाषाई अस्मिता की अवहेलना से भाषा के सिमटने का ख़तरा बना रहता है जो भाषा के लिए घातक हो सकता है| निजभाषा से जुड़ाव के जो उदाहरण हमें तमिल भाषियों में, फ्रांसियों में, या बंगलाभाषियों में मिलते हैं वो प्राय: हिन्दीभाषियों में नहीं मिलते| इसे आप मेरी  ‘नकारात्मकता’ समझने की जल्दी न करें| मैं भी इस प्रकार की बात करने वालों को ‘नकारात्मक’ ही मानता रहा था परन्तु तठस्थ होकर विचार करें तो लगेगा कि बात में वजन तो है|
हिन्दी भाषियों ने अपनी भाषा के लिए कभी कोई आन्दोलन या संघर्ष किया हो, इतिहास में इसके साक्ष्य नहीं मिलते, क्षेत्रीय स्तर पर कुछेक छुट-पुट घटनाएँ जरूर हैं| स्वतंत्रतापूर्व या स्वतन्त्रोत्तर भारत में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने का विमर्श आमजन का आन्दोलन था इसमें संदेह है| प्रभाकर क्षोत्रीय  लिखते हैं 
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का स्वप्न हिंदीभाषियों का नहीं था| राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी आवश्यकता सबसे पहले अहिन्दीभाषियों ने ही अनुभव की| हिंदीभाषियों ने तो उनके स्वर में स्वर मिलाया, ताकि अन्हें नकारा न मान लिया जाए| ’1
इतना अवश्य है कि हिन्दी के विरोध में जो आन्दोलन हुए वह हिंसक हो गये थे जिनकी प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तर भारत में कुछ प्रदर्शन आदि अवश हुए| उस दौर में हिन्दी भाषा को हिन्दू धर्म से जोड़कर खूब राजनीति हुई जिस कारण हिन्दी का जनाधार खंडित हुआ| गांधी जी को कहना पड़ा कि हिन्दी नहीं बोलना चाहते तो हिन्दुस्तानी बोल लो| ये हिन्दुस्तानी कुछ और नहीं हिन्दी का ही वह रूप था जिसमे उर्दू-फारसी के शब्दों का खुलकर प्रयोग किया जाता था| लिपि को लेकर उनके मन में कभी कोई संशय नहीं था| वे देवनागरी में लिपि एक ऐसी भाषा के पक्षधर थे जो सभी देशवासियों के लिए सहज हो| वह तो अखिल भारतीय भाषाओं के लिए सिर्फ एक ही लिपि रखन चाहते थे|
‘आर्य भाषाओं में इतनी समानता है कि अगर भिन्न-भिन्न लिपियाँ सीखने में बहुत-सा समय बर्बाद न करना पड़े तो हम सब किसी बड़ी कठिनाई के बिना कई भाषाएँ जान लें|’2

इसके लिए हिन्दी के कलेवर में अमूल-चूल परिवर्तन उन्हें स्वीकार्य था| गांधी जानते थे कि उर्दू सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ से शब्द लेकर हिन्दी समृद्ध ही होगी|    

सयानों की बात न मानने से पछतावा होता है। हुआ। स्वतंत्रता के बाद हिन्दी तर्पण के सभी अनेक प्रयास किये गये| सरकार के बड़े बाबुओं ने 'अंग्रेजी' को 'क्लास’ बनाया। अभय दूबे ने इसे बहुत प्रमाणिक और तार्किक रूप से सिद्ध किया है| उन्हीं के शब्दों में 
‘अंग्रेजी को अपनी ‘सांस्कृतिक पूंजी’ की तरह ग्रहण करने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा ने हिन्दी को कभी नहीं अपनाया|’3  
सरकारी बाबुओं की इस ‘अंग्रेजी क्लास’ से जुड़ने की इच्छा महानगरों से होती हुई छोटे शहरों तक पहुंची फिर छोटे शहरों से होते हुए कस्बों और गाँवों तक| आज छोटे-छोटे कस्बों तक में अंग्रेजी स्कूल से लेकर मैगजीनों का ऐसा बजार खड़ा हो चूका है जिसने हिन्दी को हाशिये पर ला दिया है| बजारों में दुकानों प्र लगे बोर्डों से हिन्दी गायब हो गयी है| विज्ञापनों से हिन्दी विलुप्त-प्राय: सी है| हिन्दी अखबारों ने योजनाबद्ध तरीके से खबरों में अंग्रेजी शब्द भरे| पिछले दो दशकों में जिस ‘मध्यम वर्ग’ के चारों ओर बजार नाच रहा है उसी मध्यम वर्ग ने अंग्रेजी को ‘ट्रेंडी’ या ‘इंटरनेशनल’ माना और हिन्दी को ‘देहाती’| पढ़े-लिखे ज्ञानवान होने के लिए अंग्रेजी आना पहली शर्त समझी गयी|      

लेकिन साहब मातृभाषा कोई बदन से लिपटा पुराना कपड़ा तो है नहीं वो तो अवचेतन में बसे किसी संस्कार की तरह है जो लाख चाहने पर भी पीछा नहीं छोड़ता| जैसे कोई शाकाहारी व्यक्ति लाख चाहकर भी मात्र अंडे से आगे नहीं बढ़ पाता| ऐसे ही अंग्रेजी के दो चार वाक्य सीखने पर कोई अपनी मातृभाषा नहीं छोड़ सकता| शिकायत बस इस बात की है कि हिन्दी बोलने में हमे वो गर्व नहीं होता जो बंगाल के व्यक्ति को बंगला बोलने पर होता है या तमिलनाडु के व्यक्ति को तमिल बोलने पर| हिन्दी वालों के साथ अक्सर देखा गया है कि अभिजात्य वर्ग के संपर्क में आते ही उनके मुख से अंग्रेजी शब्द निकलने लग जाते हैं| हम केरला में हो या असम में अपनी बात समझाने के लिए अंग्रेजी का ही प्रयोग करते हैं| शादी का कार्ड हो या मुंडन का हमे, ‘इंग्लिश’ में ही अच्छा लगता है| दसवी पास को भी अगर आप नाम लिखने को कहेंगे तो रोमन में लिखेगा| हम मायानगरी के सितारों को हिन्दी रोमन में पढने के लिए कोसते हैं लेकिन कभी-कभी लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब दिल्ली में बैठा हिन्दी समाचार पढने वाला न्यूज़ एंकर भी कहेगा ‘यार रोमन में लिखकर दिया करो – फ्लो आएगा !’

पिछले दो दशकों में मध्यम वर्ग से उपजे इंजीनियर और प्रोफेशनलों की नयी बिरादरी ने नोएडा, गुडगांव, गुरुग्राम, बैंगलूरू, हैदराबाद आदि शहरों में घर बसाया| इन पढ़ें लिखे मजदूरों के आलीशान फ्लैटों में देखें तो पायेंगे कि दक्षिण भारतीय जहां घर में अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हैं वहीं उत्तर भारतीय बड़े गर्व से बताते हैं कि ‘मेरे 5 साल के बच्चे को हिन्दी नहीं आती|' छोटे शहरों से गये ये उत्तर-आधिनिक (Post modern)  मां-बाप अपने बच्चों से अंग्रेजी में ही बात करते हैं| विकसित देशों पर लट्टु ये  होनहार ये नहीं सोचते कि इन देशों में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने का प्रावधान क्यों है?

लोकतांत्रिक समाज में सबसे आसान काम है सरकार को दोष देना। हिंदी की दुर्दशा के लिए भी हम ये ही करते हैं। पर हिंदी सदा ही संघर्षशील भाषा रही। लड़ती रही, बढ़ती रही। हिंदी आज भी बढ़ रही है पर अफसोस अपनों से उसे वो प्यार नहीं मिला जिसकी वो हकदार है।
  

  1. हिन्दी कल आज और कल – प्रभाकर क्षोत्रीय - पृष्ठ सं. 13
  2. स्वराज्य का अर्थ माहत्मा गांधी पृष्ठ सं.36
  3. हिन्दी में हम- अभय दूबे- पृष्ठ सं.45




Thursday, 26 July 2018

हिंदी का विस्तार

हाल ही में जनगणना 2011 की भाषा संबंधी आंकड़े जारी किए गए। इन आंकड़ों में जिस बात ने सबका ध्यान खींचा वह है दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी का विस्तार। हिंदी को मातृभाषा कहने वालों की संख्या में कुल 2.33% की वृद्धि हुई है। इससे उन लोगों के मुंह पर ताले लग गए हैं जो कि हिंदी को पिछड़ती हुई, सिकुड़ती हुई या दबी कुचली भाषा मानते रहे हैं। हिंदी के भविष्य को लेकर तथाकथित तौर पर चिंतित बुद्धिजीवियों को भी कुछ देर ए.सी. में जाकर चैन की सांस लेने का मौका मिला है।

इस बीच भारतीयों ने हिंदी को बिना किसी सरकारी प्रोत्साहन और राजनीतिक विरोध के  स्वतः स्फूर्त अपनी मातृभाषा अंगीकार कर लिया। जागरण जोश.कॉम में छपी खबर के अनुसार 1971 से 2011 के बीच हिंदी 161 प्रतिशत बढी है।1 हिंदी अकेली भाषा नहीं है जिसमें वृद्धि देखी गयी है, मराठी भर तेलुगू को पीछे छोड़ भारत की तीसरी सर्वाधिक बड़ी मातृभाषा बन गई है।2 संस्कृत को मातृभाषा मानने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। कोंकणी और उर्दू का ग्राफ नीचे आया है।3
हिंदी के विस्तार को लेकर जानकारों के अपने अपने तर्क हैं। मीडिया में इसे दो थ्येरी के जरिए समझाया जा रहा है। एक, दक्षिणपंथी विचारधारा के राजनीति में प्रभावशाली होना इसका कारण है।4 दूसरा, आर्थिक केंद्रों का दक्षिण में खिसकना और दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित होना ।
थोड़ी गहनता से विवेचना करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि यह तर्क कितने सटीक है।

पहले विवेचन में  दक्षिणपंथी विचारधारा के मजबूत होने की बात कही गई है परंतु जनगणना 2011  में शुरू हुई और 2011 तक हुए सामाजिक परिवर्तन को ही तथ्य रूप में प्रस्तुत करती है। 2014 तक आते-आते डाटा संग्रहण का काम लगभग समाप्त हो जाता है। 2014 के बाद केंद्रीय परिदृश्य में दक्षिणपंथी राजनीतिक ताकतें  उभरती हैं। इसके अलावा प्रथम बार जनगणना में डाटा संसाधन ICR ( Intelligent Character  Recognition) पद्धति द्वारा किया गया जो एक पूर्णतः कंप्यूटरीकृत प्रक्रिया है।5 'मातृभाषा' के बारे में यह आंकड़े  इतने विलंब से आए यह जरूर चौंकाने वाली बात है, परंतु इसके लिए वर्तमान सरकार से अधिक हमारी सामाजिक वरियताओं में 'मातृभाषा' या 'भाषा' का स्थान अधिक उत्तरदायी है। इस प्रकार आंकड़ों को स्वीकारने की बजाए प्रक्रिया को दोष देना कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे चुनाव परिणाम के लिए वोटिंग मशीन को कोसना।
दूसरा दृष्टिकोण कुछ अधिक तार्किक लगता है परंतु समग्र विवेचन प्रस्तुत करने में कुछ कसर छोड़ देता है| इस विश्लेषण में आर्थिक केंद्र दक्षिण भारत में चले जाने की बात मानी गई|6 साथ ही जनसंख्या वृद्धि दर में इसके कारण तलाशे गए हैं| यहाँ प्रश्न है कि आर्थिक केंद्र से तात्पर्य क्या बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई जैसे शहरों से ही है| इनके बरक्स विकसित हुए गुड़गांव और नोएडा को आर्थिक केंद्र क्यों नहीं माना जाना चाहिए? स्थिति और अधिक स्पष्ट हो पाती यदि हमें पता चल पाता कि नोएडा और गुड़गांव में कितने लोगों ने दक्षिण भारतीय भाषाएं सीखी और दक्षिण राज्यों के उक्त महानगरों में कितने लोग व्यापार के लिए टूटी-फूटी हिंदी सीखें| यह आंकड़ा भले ही हमारे पास नहीं है परंतु एक बात स्पष्ट है कि भारत में कहीं भी भिन्न भाषा-भाषी लोग मिलते हैं तो आमतौर पर संपर्क भाषा हिंदी ही होती है इस तरह हिंदी न जानने वालों पर हिंदी में बोलने या हिंदी सीखने का एक समाजिक दबाव स्वत: ही आ जाता है| जनांकिकी (Demography) में परिवर्तन मातृभाषा में परिवर्तन का एक बड़ा कारण है इसे नकारा नहीं जा सकता परंतु हिंदी विस्तार के पूरे विमर्श को भाषा की मूल प्रवृति से अनिभिज्ञ होकर देखना स्वयं को अंधेरे में रखना होगा|
 
सिद्धांतत: बात बोझिल न बन जाए इसलिए उपमा से समझना श्रेयस्कर है|  भाषा के जीवनकाल में हिंदी के लिए यह तरुणाई है अभी उसे युवा होना है| वर्तमान परिवेश में वैश्विक स्तर पर भाषाओं की स्थिति को देखें तो हम पाएंगे कि बड़ी भाषाओं का दबाव छोटी भाषाओं पर निरंतर बढ़ रहा है| इससे भाषाई विविधता बुरी तरह प्रभावित हो रही है| यह समान्यतः डार्विन के सिद्धांत की तरह है – संघर्ष में जीतेने वाला ही शेष बचा रह जाएगा| चूंकि भाषा महज़ अभिव्यक्ति का साधन नहीं है अपितु संस्कृति की संवाहिका भी है इसलिए दुर्लभ और संकटग्रस्त भाषाओं की रक्षा करना सभी का दायित्व हो जाता है| इस बीच बहुत चिंताजनक तथ्य यह है कि भाषाई विविधता सूची में भारत का स्थान 2009 में नौवें स्थान से लुढ़क कर 2017 में चौदवे स्थान पर पहुंच गया है|7 जनजातीय भाषाएं तेजी से समाप्त हो रही हैं और बहुसंख्यक समाज इससे निश्चिंत है| नीति निर्धारक धारक मुंह फेरे खड़े हैं| भारत में ही नहीं कमोवेश पूरे विश्व में संकटग्रस्त भाषाओं का दायरा तेजी से बढ़ा है और लगभग समूचे विश्व में बहुसंख्यक समाज और नीति निर्धारक इसकी गम्भीरता से अछूते हैं|

बहारल हमें याद रहे कि आज से
70-80 साल पहले कुछ लोग हिंदी और उर्दू को लेकर लड़ रहे थे। उन्हें स्थापित करने का प्रश्न वर्चस्व का प्रश्न मान रहे थे। कुछ 40 साल पहले हमारे तमिल  साथी हिंदी को अपना बैरी मान रहे थे। आज समय ने सिद्ध कर दिया कि दीर्घकालिक रूप से भाषा आंदोलनों और राजनीतिक कारणों से नहीं बदलती। भाषा समाज की संपत्ति है। समाज भाषा को जिधर मर्जी ले जा सकता है। भाषा पर समाज का एकाधिकार है।



1. https://m.jagranjosh.com/current-affairs/language-census-2011-surge-in-hindi-speakers-south-indian-language-and-urdu-speakers-decline-1530869001-1
Dt.6july 2018
2.https://m.navbharattimes.indiatimes.com/state/otherstates/bangalore/chennai/according-to-language-data-of-2011-census-hindi-bangla-odia-speaking-increases-in-south-india/-/articleshow/64773099.cms दि.28.जून 20018
3. See 1 Above.
4. https://www.livemint.com/Politics/D6pwgtFdtBmhOUJoGNA3sL/What-census-data-on-languages-shows-about-migration-in-India.htm
Dt. July 5 2018

5.https://blog.socialcops.com/intelligence/data-stories/step-step-guide-2011-census-successes-faliure-questions/
6. See 2. Above
7. See 2. Above
8. See 1 Above  for Source of Statement 4 & 6.


Tuesday, 26 June 2018

बेखबर है ये खबर

मैंने tv जब भी खोला है अनायास ही न्यूज़ चैनल लग जाता है। जिस उम्र में लडके क्रिकेट का शौक रखते थे उस उम्र में हमें मतगणना  का परिणाम  सुनने में मजा आता था। स्नातक के बाद तो पत्रकार बनने का सपना कुछ ज्यादा ही बेचैन करने लगा था पर हम मास्टरी  की तरफ निकल लिए और वहां से कहां कहां होते हुए आज यहां पहुंच गए ।

ज्यादा तो याद नहीं लेकिन हमारी तरुणाई में 'आज तक' का बचपन समाहित था। नये-नये न्यूज़ चैनल पैदा हो रहे थे। एक चस्का-सा था एक ही न्यूज़ को हर चैनल पर बदल बदल कर देखने का। आशुतोष, पुण्य प्रसून बाजपेई, रवीश कुमार, दीपक चौरसिया को सुनने में हमें वैसा ही आनंद आता था जैसे किसी क्रिकेट प्रेमी को सचिन को खेलते हुए देखने में। लेकिन लगता है सब अतीत की बात हो गई है अब न्यूज़ हमें उतनी ही बेस्वाद लगती है जितनी किसी बुजुर्ग व्यक्ति को बाजार में बिकने वाला देसी घी। आज के दौर के न्यूज़ चैनल कुछ इस कदर प्रोफेशनल हुए कि मेरे जैसा दर्शक उनके लिए 'आउटडेटेड' हो गया।  पिछले 3-4 सालों में जिस कदर मीडिया घरानों का राजनीतिकरण और व्यवसायीकरण मुखर हुआ है उतना पहले नहीं था। आज सभी मीडिया हाउस पार्टियों का दामन थामे पीछे पीछे चल रहे हैं।

समाचार वाचक या पत्रकार किसी पार्टी का कार्यकर्ता-सा लगता है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि जिन कार्यक्रमों को मैं रुचिकर मानता था जल्दी ही मुझे निराश करने लगेंगे। हाल ये हो गया है कि सत्ता से प्रश्न करते समय घाघ से घाघ पत्रकार भी मिमयाने लगते हैं और फुद्दू लाल किस्म के पत्रकार चिल्ला-चिल्लाकर सत्ता के पकड़ाये हुए पर्चे में से खोखले प्रश्नों को तीरंदाज की तरह दागते हुए नजर आते हैं।


मेरा जन्म आपातकाल के बाद हुआ और 31 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मैंने न्यूज़ चैनलों की बाढ़ देखी। सहयोगी दलों से मिलकर 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' की बैसाखियों से चलती लुंज-पुंज सत्ता का दौर था वह। मीडिया को चौथा स्तंभ मानने का दौर। तब भी सब कुछ अच्छा और साफ सुथरा तो नहीं रहा होगा परंतु पत्रकारों के हाथों में माइक था जिसमें से चुटिले प्रश्न निकलते थे और कलम था जो जन-जन के  सवाल का हाल लिखता था और हमारे हाल पर सवाल उठाता था। मीडिया घरानों के आका तब भी रहे होंगे पर शायद किसी जहांपनाह को इन  'मुनादी वालों' की ताकत इस कदर अंदाजा नहीं था या था भी तो विपक्ष से ज्यादा विरोध करने वाले तथाकथित सहयोगी दलों को साधने में इतनी फुर्सत ही न थी कि मीडिया मैनजमेंट की ओर ध्यान दें। अब सरकार बहुमत के साथ-साथ फुर्सत में भी है। सरकार यह समझ चुकी थी कि यह मुनादी वाले नहीं हैं यह तो मुफ्त में बंटने वाला रे-बैन का वो चश्मा है जिसे हर कोई लगाना चाहता है। इसको जिस रंग में रंग दे दुनिया वैसी ही नजर आएगी । बहुमत भी ऐसा प्रचंड मिला की 2-4 को इस काम पर लगा दिया गया है कि 'हुक्मरानों की शान में गुस्ताखी न हो'। बात मुंह से निकलने की देर थी कि सब के छिपे हुए मंसूबे बाहर आ गये। जिसे विज्ञापन चाहिए था, उसने विज्ञापन लिया, जिसे कुर्सी चाहिए थी, कुर्सी मिली जो हवा का रुख नहीं समझे उन्हें झटका मिला। झटके में डट के खड़े रहने का दुष्कर कार्य भी हुआ है। दुष्कर कार्य करने वाले वो ही हैं जो आदिकाल से वाम भाग में बैठकर भगवे के शेड्स में भिन्नता गिनाते रहे हैं। ऐसे बलवान जो निज़ाम बदलने से पहले मिमयाते थे, जिनके कलमवीरों को पिछली सरकार के मीडिया सलाहाकार तक के पद मिले उसी कम्पनी बहादुर के कुछ पत्रकार अब निष्पक्षता का लबादा ओढ़ छाती पीट-पीट कर खुद को दीन-हीन असहाय तथाकथित क्रांतिवीर सिद्ध करने में लगे हैं। प्राइम टाइम में धाराप्रवाह हिंदी बोलकर हिन्दू-मुसलमान की बहस से बचते  साहब बहुत सावधानी से उस विषय को चुनते हैं जो पूर्व सत्ताधारियों को ऑक्सिजन दे सके।सरकार का जितना विरोध इन्होंने किया है उतना तो विपक्ष ने नहीं किया। यह खबरनवीस तार्किक हैं, बुद्धिमान हैं और भी बहुत कुछ हैं पर मैं साहब को निष्पक्ष नहीं कह पाऊंगा।


बस अब यूं समझिए खबर से पहले खबर देने वाली कम्पनी और उसके निहित स्वार्थ नज़र आने लगते हैं। तो आजकल खबर देखना पढ़ना बन्द है और जबसे ऐसा किया है चारों ओर शन्ति छा गयी है। यकीं न हो तो आप भी ऐसा करके देख सकते हैं...

Tuesday, 20 February 2018

भाड़े की टेंशन

साहब आदमी को टेंशन बहुत है| अपनी तो है ही दूसरे की भी है| जिसके पास अपनी कम है उसने दूसरे की किराए पर ले रखी है बल्कि जिसके पास अपनी रखनी की जगह नहीं है उसने भी इधर-उधर की लेकर अपने पास भर रखी है|
मेरे एक परम मित्र, जो आयु में मुझसे ढाई गुना हैं, उन्हें इस बात की टेंशन है कि लोगों को पेंशन के लिए बहुत धक्के खाने पड़ते हैं| लेकिन इस टेंशन से त्रस्त होकर भी वो किसी जरूरतमंद के लिए आवेदन लिखने या किसी अनपढ़ के साथ बैंक जाने वालों में से नहीं हैं| उन्हें लगता है कि सिस्टम को कुछ सरल होना चाहिए जिससे गरीब और अनपढ़ लोग पेंशन योजनाओं का तवरित और भरपूर लाभ उठा सकें| इसके लिए उन्होंने आधा दर्जन उपाय भी ढूंढ निकाले हैं| असल में सोचना जितना आसान काम कुछ नहीं है| जब हम कुछ नहीं करना चाहते तब हम सोच-सोच कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं| मेरे मित्र सज्जन आदमी हैं जो समाज का भला सोचते हैं लेकिन मात्र सोचते हैं| मैं उनके व्यक्तित्व का छिद्रान्वेषण करके उन्हें झक्की सिद्ध करने से पहले आपके सामने कुछ सिचुएशन क्रियेट करने का जोखिम उठाना चाहाता हूँ| 
सिचुएशन 1 – आपकी पत्नी कामकाजी महिला है और आपको लगता है कि उसके कार्यस्थल पर वह कुछ ज्यादा सिंसियर कर्मचारी है या बनने के लिए घर-परिवार से समझौते कर रही है/ वह अपने काम के प्रति लापरवाह है और उसके कार्यस्थल पर उसकी छवि अच्छी नहीं है| दोनों स्थितियों के बारे में आप क्या करेंगें?
सिचुएशन 2 –  आपके बेटे/बेटी की क्लास में टीचर एक विषय को ठीक से नहीं पढ़ा रहा जिस विषय में आपको महारथ हासिल है| बालक ने इसी विषय की ट्यूशन भी लगा रखी है| फिर भी विषय पर उसकी पकड़ वैसी नहीं बन पा रही जैसी आप चाहते हैं| आप क्या करेंगें?
सिचुएशन 3 –  आपके ऑफिस में आपके काम को वैल्यू नहीं किया जाता। जिनको कुछ नहीं आता बॉस उन्हीं को प्रमोट करता है। आप tense रहते हैं और switch करना चाहते हैं। 
अरे भाई अपनी टेंशन छोड़नी है तो पहले ये तो तय करो की ये 'अपनी' है भी या नहीं। बीवी की टेंशन बीवी की है बच्चे की टेंशन बच्चे की है। अमा यार 'अपनी' टेंशन को कम से कम अपने पास तक आने तो दो, आप तो खुद ही उसके गले लगने के लिये उतावले हुए जाते हो।
बीवी के कार्यस्थल पर छवि कैसी है इससे आपको क्या! जो नौकरी करने की समझ रखती है वो इस बात की भी समझ रखती होगी कि उसने कब कहाँ कैसा व्यवहार करना है। अगर कर सकें तो बस घर के साथ सामंजस्य बैठाने में उसकी थोड़ी मदद कर दीजिए। इसी तरह अगर बच्चे को पढ़ाने के लिए कुछ समय निकाल पाएं तो ठीक है और अगर न भी निकाल पाएं तो परेशान क्यों होते हैं आखिर मेहनत भी तो इसलिए कर रहे हैं कि उस पढ़ा सके, अच्छा जीवन दे सकें। अब तीसरी समस्या। ये बहुत कॉमन है। अगर नौकरी छोड़ने के कारण ये ही हैं तो यकीन मानिए ये समस्या नयी नौकरी में भी मिलेगी। किसी भी नौकरीपेशा आदमी से बात कीजिए ये ही कहेगा 'नौकरी' शब्द में ये भाव अंतर्निहित हैं।
इसलिए टेंशन वेंशन क्यों लेते हो जाने जाना
चार दिन की जिंदगानी मुस्कुराना  ...
टेंशन कम करने का मंत्र यही है कि परिवेश बदलने की बजाए खुद को बदलिए , दूसरे की  टेंशन मत लीजिए बाकी बची अपनी वो तो आप सम्भाल ही लोगे। वैसे कोशिश करें कि बहुत सोचने की बजाए कुछ थोड़ा सा भी 'करें' तो बेहतर होगा।

पुस्तक समीक्षा

उजास की तलाश है – 'मनुष्यता का पक्ष'
एक ऐसे समय में जब विश्व भर में कट्टरता और अधिक विद्रूप होती जा रही है, जब राष्ट्रवाद एक वीभत्स नस्लवाद का रूप ले चुका है, जब धर्म हिंसक उन्माद बनकर युवा नसों में विष घोल रहा है, जब किसी सरहद पर खड़े शरणार्थी देश में घुसने के लिए मरने तक को तैयार हैं, जब व्यवस्था किसान की ओर मुंह करके सो रही है और किसानों की आत्महत्या मीडिया के लिए महज एक संख्या बनकर रह गई है तब मनुष्यता की बात करना उन सब के हक की बात करना है जिनकी आवाज़ गले में ही घोंट दी गई है|
लेखक ने पुस्तक को तीन भागों में बांटा है जिसके सहारे वह साहित्य से लेकर रंगमंच और फिल्मों तक से मानवीय पक्ष में लामबंद मनीषियों की रचनाओं और कृतियों में बिंधे विचारों को परत दर परत खोलता है| भवानी प्रसाद मिश्र की जन्मशती पर उनके काव्य का पुनर्पाठ करते हुए लेखक उनकी कविताओं को गांधीवादी चश्मा हटाकर देखने का प्रयास करता है| ‘गीत-फरोश’ या ‘सतपुडा के घने जंगल’ के कवि की ‘मरे नहीं लड़ाई में’, ‘हम दुनिया के सत्ताधारियों को’, ‘शस्त्र बनाने वालों’, ‘युद्ध का नाम जुबान पर मत आने दो’, ‘युद्ध की वकालत में’ जैसी कविताओं को चिन्हित कर उन्हें गुंटर ग्रास या नाजिम हिकमत के समानांतर रखकर देखने का पक्षधर है| लेखक भवानी प्रसाद मिश्र के जन्मशती वर्ष में विश्व शांति की तलाश में उसका सहयोगी बन जाता है तो ‘बलदेव खटीक’ की पीड़ा को भी जीता है और वहां छिपी उजास की बारीक रेखा को भी रेखांकित करता है , "उजास की तलाश लीलाधर जगूड़ी का मूल प्रश्न रहा है किंतु जब समय अंधेरों के घटाटोप में घिरी दोपहर का हो, तब कविता की भूमिका बड़ी हो जाती है वह बुनियादी सवालों से टकराए एवं प्रतिरोध विहीन समय में प्रतिरोध एवं हस्तक्षेप की निर्मिति करें ।"
 
लेखक की समीक्षा गल्प, आख्यान एवं फैंटसी के शिल्प में मोती की तरह छिपी संवेदना का विस्तार से सरलीकरण करती चलती है| लेखक ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ के स्रष्टा वीरेन डंगवाल की प्रतिबद्धताओं को उकेरता है| राजेश जोशी की ‘जादूगरनी’ ‘प्रजापति’ ‘मारे जाएंगे’ ‘नेपथ्य में हंसी’ ‘भरोसे की डोर’ ‘घबराहट’ कविताओं के जरिए राजेश जोशी की सृष्टि-दृष्टि को ‘बारूद की गंध’ में ‘उम्मीद स्वप्न और आकांक्षा’ का कवि माना गया है| ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ जैसी सरल, मार्मिक और चुटीली कविता  लिखने वाले राजेश जोशी का कृतित्व ही  साम्राज्यवादी और वितंडतावादी ताकतों से टकराकर सर्वहारा के लिए न्याय की मांग करता है| इतिहास जिन त्रासदियों का साक्षी रहा है वही त्रासदियां रूप बदलकर फिर खड़ी हो जाती है क्योंकि सत्ता इतिहास से नहीं स्वार्थ से चालित होती है| यूरोप में प्रवेश के लिए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते शरणार्थी हों या समुद्री रेत पर लहरों में बहता एलन कुर्दी हो या भारत विभाजन के दौरान हुई बर्बरता, शरणार्थी सत्ता के आगे घुटनों पर बैठा ही नजर आता है| राष्ट्र किसी मनुष्य से कहीं अधिक स्वार्थी होता है| भीष्म साहनी के कथा साहित्य की मूल चेतना बन चुकी इस पीड़ा को विपिन इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं

“भीष्म साहनी की कहानी के अंत:करण पर बात की जाए तो देश विभाजन के आसपास उभर रहे फिराकपरस्ती के परिवेश एवं निजी धार्मिक पहचानों को लेकर बढ़ती कट्टरता की प्रवृत्ति का उनकी कहानी पर्दाफाश करती है। फिजाओं में तैर रहे अलगाव को बहुत दूर से पहचान लेने की क्षमता ही उन्हें विशिष्ट  रचनाकार बनाती है|”
गुलजार की लिखी फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ में इसी सब्जेक्ट के ट्रीटमेंट को किस कदर भावातिरेक से जोड़ा गया है इसकी तस्वीर भी किताब में आगे स्पष्ट हो जाती है। 
पुस्तक के दूसरे खंड के लिए लेखक ने नोबेल विजेता विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों को चुना है| मार्खेज और गुंटर ग्रास द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि से उपजे संत्रास, नीरवता और ग्लानि बोध के स्वर हैं|
परवीन शाकिर और इजाडोरा इस विमर्श में स्त्री जगत की पीड़ा को अलग ढंग से चित्रित करती हैं| अपनी प्रेम-कविताओं के लिए प्रसिद्ध पाब्लो नेरुदा का इस खंड के लिए  चयन कुछ हैरान करता है परंतु नेरुदा को पढ़ना या उनके बारे में परिणाम हमेशा दिलचस्प रहता है|

यहां लेखक केवल साहित्यकारों की आलोच्य कृतियों की विषय-वस्तु तक ही सीमित नहीं रहता, वह उस विषय-वस्तु में गुंथे परिवेश को पकड़ता है, उस समाज के इतिहास और वर्तमान में उतर कर वहां की चेतना और समस्याओं को भी पाठकों के सामने रखता है| हिंदी पाठकों के लिए विस्सावा शिम्बोर्स्का और हंगरी लैजलो क्रैसना होर्काई को पढ़ना सम्भवत: नया अनुभव होगा| अहमद फराज और आज के दौर में खालिद हुसैनी हमारे अपने से ही हैं| अफगानिस्तान के उपन्यासकार, खालिद हुसैनी का उपन्यास ‘दी काईट रनर’ महाकाव्यात्मक विस्तार लिए हुए हर अफगानिस्तानी की वेदनाओं की चीत्कार है जो तालिबान से छुटकारा पाना चाहता रहा परन्तु अमरीकी आक्रमण में वह ही जख्मी हो रहा है, उसी का गाँव जलाया जा रहा है, उसी का कच्चे मकान जमीन पर बिखरा हुआ है| बाद के वर्षों में खालिद हुसैनी अमेरिका जा बसे| उनकी बदली हुई प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करने में विपिन जरा देर नहीं करते|
‘यहाँ पर एक सवाल यह भी उठाता है लियोनेद ब्रेजनेव और रोनाल्ड रीगन के प्रसंगों के माध्यम से खालिद हुसैनी अमेरिका को देवदूत के रूप में प्रस्तुत करते मगर जो अमेरिका ने तालिबान के सफाए के नाम पर किया, वह भी उतना ही जघन्य अपराध है|’
लम्बे समय से फिल्मों की गम्भीर समीक्षा कर रहे विपिन की ललित कला की समझ प्रभावित करती है| ‘रंग में देखती’ और ‘खुशबू में सोचती’ अमृता शेरगिल का निधन 1941 में हुआ लेकिन उनकी कलाकृतियाँ और उनकी बेबाक जीवन-शैली पितृसतात्मक समाज से विद्रोह करती रही|
  पुस्तक के अनेक लेख प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं| वैश्विक साहित्य को जिस अंतर्दृष्टि से पकड़ा गया है वह हिंदी पाठकों के लिए असाधारण है| शीर्षकों में विपिन की रचनात्मकता दिखती है| कुल मिलाकर चबा-चबाकर पढने वाली पुस्तक..|   
(दैनिक जनवाणी में 14 जनवरी को प्रकाशित।साभार)