Tuesday, 26 June 2018

बेखबर है ये खबर

मैंने tv जब भी खोला है अनायास ही न्यूज़ चैनल लग जाता है। जिस उम्र में लडके क्रिकेट का शौक रखते थे उस उम्र में हमें मतगणना  का परिणाम  सुनने में मजा आता था। स्नातक के बाद तो पत्रकार बनने का सपना कुछ ज्यादा ही बेचैन करने लगा था पर हम मास्टरी  की तरफ निकल लिए और वहां से कहां कहां होते हुए आज यहां पहुंच गए ।

ज्यादा तो याद नहीं लेकिन हमारी तरुणाई में 'आज तक' का बचपन समाहित था। नये-नये न्यूज़ चैनल पैदा हो रहे थे। एक चस्का-सा था एक ही न्यूज़ को हर चैनल पर बदल बदल कर देखने का। आशुतोष, पुण्य प्रसून बाजपेई, रवीश कुमार, दीपक चौरसिया को सुनने में हमें वैसा ही आनंद आता था जैसे किसी क्रिकेट प्रेमी को सचिन को खेलते हुए देखने में। लेकिन लगता है सब अतीत की बात हो गई है अब न्यूज़ हमें उतनी ही बेस्वाद लगती है जितनी किसी बुजुर्ग व्यक्ति को बाजार में बिकने वाला देसी घी। आज के दौर के न्यूज़ चैनल कुछ इस कदर प्रोफेशनल हुए कि मेरे जैसा दर्शक उनके लिए 'आउटडेटेड' हो गया।  पिछले 3-4 सालों में जिस कदर मीडिया घरानों का राजनीतिकरण और व्यवसायीकरण मुखर हुआ है उतना पहले नहीं था। आज सभी मीडिया हाउस पार्टियों का दामन थामे पीछे पीछे चल रहे हैं।

समाचार वाचक या पत्रकार किसी पार्टी का कार्यकर्ता-सा लगता है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि जिन कार्यक्रमों को मैं रुचिकर मानता था जल्दी ही मुझे निराश करने लगेंगे। हाल ये हो गया है कि सत्ता से प्रश्न करते समय घाघ से घाघ पत्रकार भी मिमयाने लगते हैं और फुद्दू लाल किस्म के पत्रकार चिल्ला-चिल्लाकर सत्ता के पकड़ाये हुए पर्चे में से खोखले प्रश्नों को तीरंदाज की तरह दागते हुए नजर आते हैं।


मेरा जन्म आपातकाल के बाद हुआ और 31 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मैंने न्यूज़ चैनलों की बाढ़ देखी। सहयोगी दलों से मिलकर 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' की बैसाखियों से चलती लुंज-पुंज सत्ता का दौर था वह। मीडिया को चौथा स्तंभ मानने का दौर। तब भी सब कुछ अच्छा और साफ सुथरा तो नहीं रहा होगा परंतु पत्रकारों के हाथों में माइक था जिसमें से चुटिले प्रश्न निकलते थे और कलम था जो जन-जन के  सवाल का हाल लिखता था और हमारे हाल पर सवाल उठाता था। मीडिया घरानों के आका तब भी रहे होंगे पर शायद किसी जहांपनाह को इन  'मुनादी वालों' की ताकत इस कदर अंदाजा नहीं था या था भी तो विपक्ष से ज्यादा विरोध करने वाले तथाकथित सहयोगी दलों को साधने में इतनी फुर्सत ही न थी कि मीडिया मैनजमेंट की ओर ध्यान दें। अब सरकार बहुमत के साथ-साथ फुर्सत में भी है। सरकार यह समझ चुकी थी कि यह मुनादी वाले नहीं हैं यह तो मुफ्त में बंटने वाला रे-बैन का वो चश्मा है जिसे हर कोई लगाना चाहता है। इसको जिस रंग में रंग दे दुनिया वैसी ही नजर आएगी । बहुमत भी ऐसा प्रचंड मिला की 2-4 को इस काम पर लगा दिया गया है कि 'हुक्मरानों की शान में गुस्ताखी न हो'। बात मुंह से निकलने की देर थी कि सब के छिपे हुए मंसूबे बाहर आ गये। जिसे विज्ञापन चाहिए था, उसने विज्ञापन लिया, जिसे कुर्सी चाहिए थी, कुर्सी मिली जो हवा का रुख नहीं समझे उन्हें झटका मिला। झटके में डट के खड़े रहने का दुष्कर कार्य भी हुआ है। दुष्कर कार्य करने वाले वो ही हैं जो आदिकाल से वाम भाग में बैठकर भगवे के शेड्स में भिन्नता गिनाते रहे हैं। ऐसे बलवान जो निज़ाम बदलने से पहले मिमयाते थे, जिनके कलमवीरों को पिछली सरकार के मीडिया सलाहाकार तक के पद मिले उसी कम्पनी बहादुर के कुछ पत्रकार अब निष्पक्षता का लबादा ओढ़ छाती पीट-पीट कर खुद को दीन-हीन असहाय तथाकथित क्रांतिवीर सिद्ध करने में लगे हैं। प्राइम टाइम में धाराप्रवाह हिंदी बोलकर हिन्दू-मुसलमान की बहस से बचते  साहब बहुत सावधानी से उस विषय को चुनते हैं जो पूर्व सत्ताधारियों को ऑक्सिजन दे सके।सरकार का जितना विरोध इन्होंने किया है उतना तो विपक्ष ने नहीं किया। यह खबरनवीस तार्किक हैं, बुद्धिमान हैं और भी बहुत कुछ हैं पर मैं साहब को निष्पक्ष नहीं कह पाऊंगा।


बस अब यूं समझिए खबर से पहले खबर देने वाली कम्पनी और उसके निहित स्वार्थ नज़र आने लगते हैं। तो आजकल खबर देखना पढ़ना बन्द है और जबसे ऐसा किया है चारों ओर शन्ति छा गयी है। यकीं न हो तो आप भी ऐसा करके देख सकते हैं...