Thursday, 24 December 2015

नमो शिवाय

शिव का राज है। भोले बाबा के राज मेँ भूतों की मौज है। क्यों न हो? ये सब कृपा पात्र चेले हैँ उनके। शिव के लिए इन्होंने क्या-क्या न सहा? आखिर शिव अकेले ही नहीं विराजते कैलाश पर । ये बेचारे भी वहीं दिन रात मौसम की मार सहते हैँ। तभी तो शिव की असीम अनुकम्पा रहती है इन पर।

ये वो ही हैँ जो शिव बरात में आगे आगे नाच रहे थे। इन्हें पता था कि यदि शिव को कुछ मिलेगा तो इन्हें भी तो खाने को मिलेंगा। तभी तो प्रभु ने सभी को न्यौता दिया था अपनी बरात का। सभी को भरपेट खिलाना शिव का कर्तव्य था। अहा!! क्या  दृश्य था... भांति भाँति के भूत खा रहे हैँ... बड़े पेट वाले, पैने नाखूनों वाले, चार आंखों वाले, पेट में दांत थे कुछ के, कुछ के चार मुंह थे और सब दस दस हाथों से खा रहे थे। अरे डरिये मत। ये सब सहोदर हैं और आपकी तरह किसी के मध्य-देश से ही उत्पन्न हैँ। बस अंतर है इनकी भूख में। उसमें इनका क्या दोष।

खैर शिव कृपा रहे तो क्या कमी है। सकल संसार के संसाधन इनकी भूख मिटाने के लिए तत्पर हैँ। आज के दिन आनन्द बस नमो नमो करने में है। हवाओं में यह ही गूँज रहा है

सर्वनाशम  पापम व्यापम व्यापम।

पूछप्रश्नं  तत्क्षणे महाशान्ति प्राप्म॥

Sunday, 25 October 2015

गाय किसकी माता है


“पप्पी भैया प्रसिद्धी प्रसिद्धि का कोई कारण तो होना चाहिये। आप ‘राष्ट्रीय’ प्राणी हो नहीं। बहादुरी या बलवान की मिसाल आप नहीं। आपके कौशल विकास के प्रशिक्षण कार्यक्रम तक आयोजित नहीं किये जाते। अल्पसंख्यक आप नहीं। तो इतना हंगामा क्यों है।”

तबेले के पास बैठे कुत्ते से भैंस अपना दुखड़ा रो रही है। भैंस गुस्से में है। उसका बस चले तो पीछे की दो टांग मारकर गाय का नीचे का जबड़ा तोड़ दे।

“ बात आज की नहीं है। मैं बरसो से देखती आ रही हूँ। श्राद्ध हो तो गऊ माता। क्रिया हो तो गोदान। और तो और वैतरणी पार करनी हो तो गोमाता की पूंछ पकड़ लो, बीमारी में गोमूत्र पियो। अरे हद ही हो गयी। और भोली ऐसी बनेगी की जानती कुछ नहीं”

‘अब बोलेगी कुछ या जुगाली ही करती रहेगी।’

गाय को पता है कि हवा का रुख उसकी ओर है। गाय के लिये यह नई बात नहीं है। वो यह भी जानती है कि हवा बदलने से हालात नहीं बदलते। दूध न दे पाने पर उसके साथ भी वो ही होगा जो भैंस के साथ होगा। 

इसीलिए गाय चुपचाप अपनी जुगाली कर रही है ।

‘देखा बस देखती रहेगी टुकुर-टुकुर। बोलेगी कुछ नहीं।’

‘अरे कल्लो तू भी बस!!!

अरे गाय दुधरु पशु है। अगर गाय ही न रही तो हम तो दूध-ड्बल रोटी के लायक ही न रहेंगें’। पप्पी जानता है इन सभा-गोष्ठियों से कुछ होने वाला नहीं है। उसे गाय या भैंस से भी कोई सरोकार नहीं। उसे अपनी छवि साफ रखनी है और अपने फायदे पर नज़र रखनी है।'  

'अरे वाह रे मेरे श्वान प्रसाद!! जैसे हमारे थन में से तो पानी निकलता होगा।'

‘न री कल्लो पाने देने के लिये तो भगवान ने हमारे थन लगाये हैं।’ बकरी और ऊँटनी अपनी खीज रोक न पायीं और एक साथ बोली।'

'तो और मैं क्या कह रही हूँ?आखिर इस गाय में ऐसा क्या है जो मुझ में या तुम में नहीं।'

गाय अब भी चुपचाप जुगाली कर रही है।

'अरे हमे तो सारा जीवन हो गया देखते-देखते। बच्चे निबंध याद करते हैं गाय का। कभी किसी ने भैंस पर निबंध या कविता लिखी है।’ कल्लो आज बहुत गुस्से में है। पप्पी ने कुछ कहने का प्रयास किया –    ‘कल्लो उसकी ओर देख करुणा से भरी उसकी आँखे देख। कैसा निरीह जीव है।’

‘वाह भई वाह। वो निरीह जीव और हम खूंखार जानवर!!!............पप्पी महाराज आप को पता न हो तो बता दूं घास एक जैसी ही खाती हैं हम दोनों और गोबर भी एक-सा ही हगते हैं हम दोनों। जो व्यवहार इसके साथ होना चाहिये वो ही मेरे साथ भी।’

बकरी और ऊँटनी भी बोली ‘हमारे साथ भी।’

गाय बिना कुछ बोले चुपचाप जुगाली कर रही है।                         

ठीक उस समय जब सभा निष्कर्ष पर थी तभी एक महानुभाव ने सभा में बिना अनुमति के प्रवेश कर अपने हाथ में पकड़ी रोटी को इस तरह उछाला की रोटी सीधे गाय के खूंटे के आगे गिरी। गाय देख ही रही थी कि पप्पी रोटी उठा कर भाग गया।   

गाय उसे देखती रही और चुपचाप जुगाली करती रही है।

        

      

Thursday, 22 October 2015

साहब के बिस्कुट



शायद आप कभी किसी सरकारी कार्यालय में गये हों। वहां बैठे बड़े साहब (आइ.ए.एस., आइ.पी.एस., आइ.एफ.एस. आदि)के कमरे के बाहर एक छोटा कमरा भी होता है। यह कमरा आकार में कुछ छोटा है पर ओहदे में उतना ही बड़ा होता है। अधिकतर इस कमरे में एक दो चपरासी, एक दरबान, एक निजी सचिव, एक ‘ब’ श्रेणी का काबिल अधिकारी जिसका काम साहब के पास आने- जाने वालों की स्क्रूटनी करना होता हैं, बैठते हैं। ऐसे ही एक कमरे का दृश्य देखिये : 


  छोटे कमरे का ओहदा इतना बड़ा था कि  उसमें 1 ए.सी., 2 कंप्यूटर, 12 ट्यूब लाइटें और 4 पंखे चलाकर एक गंभीर मुद्दे पर चर्चा हो रही है। 


मुद्दा यह है कि साहब को चाय के साथ दिये जाने वाले साहब के पसन्दीदा बिस्कुट केवल 4 ही हैं। एक बिस्कुट साहब की प्लेट में रखा जाना है। अब समस्या ये है बचे हुए यह 3 कीमती बिस्कुट अन्दर बैठे श्रेणी ‘ब’ के चार अधिकारियों में कैसे वितरित किये जायें। साहब की निजी सचिव परेशान हैं कि अगर कोई और बिस्कुट अंदर ले जाये गये तो साहब भड़क जायेंगें। साहब की दरियादिली यह है कि वह श्रेणी ‘ब’ के अधिकारियों को भी वह अपनी ताईं मौज करना चाहते हैं। अब अगर तीन अधिकारियों को एक जैसे बिस्कुट मिलें और एक कोई रह गया तो यह मुद्दा सहाब के कमरे से बाहर आते ही आत्मसम्मान और स्वाभीमान का प्रश्न बन जायेगा। यदि गलती से साहब ने यह बदइंतज़ामी देख ली तो ‘शिष्टाचार और प्रबंधन’ का वो काड़ा पिलायेंगें कि एक हफ्ते तक पेट में मरोड़ पड़ता रहेगा।


तभी इस कमरे में बैठे एक दरबान और दो चपरासियों में से एक ने सचिव मैडम को याद दिलाया कि उसने कल अलमारी बन्द करते समय गिने थे तो 6 बिस्कुट थे। फिर दो कहां गये?  इस कमरे में बैठे एक श्रेणी ‘ब’ अधिकारी मि. नैथानी ने अपनी कार्यक्षमता का उत्क़ृष्ट नमूना पेश किया और अपनी धीर-गंभीर अवाज़ में बोले ‘अबे वो मेहता तो नहीं खा गया। उसकी प्रमोशन तो दो साल बाद है लेकिन वो साहब की सभी चीज़ों को अपने बाप का माल समझता है।’ 


(ये महेता जी दो साल बाद प्रोन्नति पाकर साहब हो जायेंगे)  


‘अरे नैथानी जी मैं तो सहाब को बता दूंगी कि महेता बिस्कुट खाता है आपके।’ निजी सचिव ने हाथ मचकाते हुए कहा।


मैडम उसे देता कौन है? हमारे बीच से ही कोई है।– ऐसा कहते हुए वे सी.आई.डी. के इंस्पैक्टर प्रद्युम्न की तरह दिख रहे थे।


‘अरे साहब चाय ठंडी हो रही है ..... क्या करूं?’ दूसरा चपरासी बोला

‘मंगवाने का समय नहीं हैं’ 

‘डांट खाने का मेरा मन नहीं है’ मैडम ने नैथानी की बात को बीच में ही काटा।
साहब की घंटी दुबारा बजी। मैडम लगभग काँप गयीं फिर संभली और चपरासियों को देख कर गुर्राईं  ‘मर जाओ कहीं जाके निक्क्मो। बिस्कुट तक नहीं संभाल सकते।’
‘अरे अंदर तो जाओ मैडम!!!’

आप चले जाओ

मैं फाइल देख रहा हूँ।

ओ हो!!! कोई बात नहीं नैथानी जी आप का भी समय आयेगा....................

(मैडम ने मन ही मन कहा)



यह तो लेखक को नहीं पता की बाद में साहब ने किस-किसको क्या-क्या कहा पर इतना वह समझ गया कि एक अच्छा कर्मचारी बनने के लिये किन-किन बातों पर ध्यान दिया जान चाहिए।