वैश्वीकरण की व्यापक और लंबी प्रक्रिया राष्ट्रों को निकट तो ले आई है लेकिन जाने- अनजाने इसने विश्व को मुनाफाखोरी और आत्मतकेंद्रियता की ओर धकेला है। आज यह बात खुले तौर पर स्वीकार की जाती है कि अर्थ तंत्र और पर्यावरण के लिहाज से सभी राष्ट्र जुड़े हुए हैं। आर्थिक रूप से एक राष्ट्र के कमजोर पड़ जाने से अनेक राष्ट्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन सभी राष्ट्रों के लिए चिंतन का विषय बना हुए है। कोरोना महामारी में भी हमने देखा कि कागज़ों पर खिंची काल्पनिक रेखाओं से मनुष्य के सुख-दुख बांटे नहीं जा सकते। इन काल्पनिक रेखाओं को जिन्हें हम राष्ट्र की भौगोलिक सीमा कहते हैं, जिनके भीतर कुछ लोग बैठ कर उसके भीतर रह रहे सभी लोगों के भाग्य विधाता होने का दंभ भरते हैं, भूमि के इन टुकड़ों की पहचान को बनाए रखने के लिए जो लोगों को उकसाते हैं, उन्हें अभी यह समझना होगा कि हम अपने कबीलों से बाहर, दूसरे कबीलों को भी हाशिए पर नहीं धकेल सकते, चाहे वह कितना ही दुर्बल हो। दुर्बल कबीले की भी जिम्मेदारी है कि वह अगल-बगल के सभी बड़े कबीले से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की प्रवृत्ति से बचें।
आज शोधकर्ता हमें बताते हैं कि पिछले कुछ समय से मानव संसाधन भी एक ऐसा ' उत्पाद' है, जो हमें साझा करना पड़ेगा। आर्थिक और सामाजिक रूप से विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर बहुत तेजी से घट रही है और उन्हें प्रशिक्षित और युवा मानव संसाधन को 'आयात' करना होगा। बहुत से पश्चिमी देशों ने प्रशिक्षित युवा वर्ग को अपने देशों में आमंत्रित करने के लिए नीतियां बनानी शुरू कर दी हैं।
राष्ट्रों की एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यही समझा जाता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। लेकिन अब इस सिद्धांत में कुछ संशोधन की आवश्यकता है। वर्तमान हालात में मानवीय वैश्विक हितों को सर्वोपरि रखकर राष्ट्रीय हितों को उसका अनुगामी बनना होगा।
इस सिद्धांत को सैद्धांतिक रूप से तो कुछ मान्यता मिलने भी लगी है लेकिन व्यवहारिक रूप में इसक सर्वथा अभाव दिखता है। यदि राष्ट्र के नीति नियंता थोड़ा भी गंभीर होकर इस सिद्धांत का अनुसरण करें तो निश्चित रूप से युद्धों को टाला जा सकता है, आर्थिक आक्रामकता रुक सकती है, जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।