Wednesday, 10 May 2017

शराब के विरोध पर मौन क्यों

स्थानीय अखबार में खबर छपी है कि रुद्रप्रयाग के कांकरा में महिलाओं ने शराब के विरोध में सामूहिक फांसी लगाने का प्रयास किया। प्रशासन ने बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें शांत कराया। इन दिनों छोटे-छोटे शहरों में शराबबंदी के लिए  महिलाएं आंदोलनरत्त  हैं।  ऐसा लगता है कि शराब बिना समाज और जीवन की कल्पना  करना ही कुछ लोगों के लिए मुश्किल है। शराब जरूरी है या नहीं की बहस शुरू हो उससे पहले जरुरी यह है इन महिलाओं की पीड़ा को समझा जाए जो बिना किसी नेतृत्व या राजनीतिक एजेंडे के एकजुट हो गई हैं और शराब के ठेकों का पुरजोर विरोध कर रही हैं। मेरे सभी प्रिय मार्क्सवादी मदिरा प्रेमी मित्र जन व्यापी आंदोलनों के प्रवर्तन को बड़ी घटना मानते हैं। एक ऐसा आंदोलन जो चाहे नितांत स्थानीय और असंगठित सही पर गंभीर मुद्दों पर स्वयंभू खड़ा हुआ यह क्या किसी बड़े आंदोलन की क्षमता नहीं रखता? पर मेरे दाढ़ीदार साथी  इसकी महत्ता से बचेंगें क्योंकि वामपंथी बिना  शराब गले के नीचे उतारे विमर्श कर नहीं सकते और दक्षिणपंथी भारतीय संस्कृति के नाम पर बहस चाहे जितनी कर लें पर शाम को खिड़कियों पर पर्दे गिरा कर तलब उन्हें भी शांत करनी है।

प्रिंट मीडिया जो मोहल्ला छाप बन चुका है, इस खबर के विस्तार को पकड़ पाने में नाकाम रहा है और तथाकथित राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए यह स्थानीय खबर से अधिक कुछ है ही नही। मोहल्ला छाप अखबारों के राष्ट्रीय MD से लेकर राष्ट्रीय खबरिया चैनलों के अंतर्राष्ट्रीय MD तक सब शराब मालिकों की विराट लॉबी के अदने से उपभोक्ता हैं तो बोलेगा कौन? सरकार !!  सरकार ने तो 2014 से शराब के कारण मरने वालों की गणना पर ही पाबंदी लगा दी है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर 96 मिनट में एक मौत शराब पीने के कारण होती है तब भी  सभ्य समाज में शराब को खराब कहना  रूढ़ीवादी माना जाता है।

तमिलनाडु में 30 वर्ष से कम आयु में  विधवा हो चुकी सर्वाधिक महिलाएं हैं। इसका बहुत बड़ा कारण शराब है। महिलाएं लाख कोशिशों के बाद भी पति की शराब छुड़ाने में असमर्थ रहती हैं। उनके पास शराब के ठेकों को बंद करवाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता। जहां आर्थिक संसाधनों की कमी होती है वहां शराब पर खर्च किया  गया धन बच्चे या परिवार पर होने वाले खर्च को और कम कर देता है। भारत के गांव और छोटे-छोटे कस्बों में खुल चुके ठेकों ने भारत की ग्रामीण जनसंख्या को तेजी से नशाखोर बनाया है।

जो लोग समझते हैं कि शराब से कोई नुकसान नहीं होता वह यह बात जान लें कि WHO ने वैश्विक रूप से अगले 10 साल में शराब की सालाना खपत को 10% कम करने का निर्णय लिया है क्योंकि WHO शराब के हानिकारक प्रभावों से भली-भांति परिचित है। मजेदार बात यह है कि शराबखोरी से अत्यधिक प्रभावित रहे केरला ने इसके लिए ठोस नीति बनायी और पिछले 3 सालों में 20% से अधिक खपत कम करके उसके मापदंड को भी छोटा कर दिया है। तमिलनाडु में जयललिता ने एक बार 500 ठेकों के लाइसेंस रद्द कर दिए थे। राजस्व की चिंता किये बिना  गुजरात और मणिपुर में नशाबंदी चालू है और आर्थिक रूप से पिछड़े बिहार  ने भी ऐसा करने का साहस दिखाया है।  बात शराब की बिक्री से कमाए गए राजस्व की ही नहीं है मुद्दा यह है कि सत्ता स्वार्थ साध रही है और देश भ्रम की स्थिति में है। भ्रम फैलाने की पराकाष्ठा यह है कि एक ओर तो हमारे नीति निर्धारक नशे के खिलाफ अभियान चलाते हैं, शराब को छोड़ने के लिए दीवारें पुतवाई जाती हैं और दूसरी ओर शराब माफियाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी तोड़-मरोड़ दिया जाता है। पूरी की पूरी व्यवस्था शराब बेचने में और बिकवाने में आतुर नजर आती है। मेरी समझ से शराबबंदी कर देना इस समस्या का कारगर हल नहीं है। जरूरत है तो स्पष्ट नीति की जो डंके की चोट पर कह सके की शराब हानिकारक है और आने वाले सालों में इस पर नियंत्रण चाहती है या शराब के स्वास्थवर्धक होने न होने से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता, वो तो बस शराब की बिक्री से मुनाफ़ा चाहती है।

विद्वानों का मानना है कि चरणबद्ध तरीकों से शराब की उपलब्धता कम करने से लोग शराब पीना कम कर देते हैं। साथ-साथ शराबियों को अनुशासित करने पर भी सख्ती से काम होना चाहिए।

शराब पीने वालों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति आमजन से 120 गुना अधिक होती है। महाराष्ट्र में शराब से मरने वालों की संख्या सर्वाधिक है। महाराष्ट्र के ही सूखा प्रभावित क्षेत्रों में शराब का क्या असर रहा है और इन क्षेत्रों में होने वाली आत्महत्याओं में इसका क्या योगदान है, यह समाजशास्त्रीय शोध का विषय हो सकता है। आज के युग में गांधी की बात करना मूर्खता ही है लेकिन फिर भी राष्ट्रपिता का मानना था कि शराब मनुष्य को नैतिक रुप से दुर्बल बनाती है। आज हो रहे शोध भी कुछ अलग नहीं कह रहे 'Alcohol increases impulsivity and decreases inhibition it increases negative self image and decreases self esteem deepens  depression and socialization and rises with the amount and length of time alcohol is consumed.' (source http://www.mes.org/pages/sucide_fact_alcohol.PHP)

मेरा इरादा अपने शराबी मित्रों की नैतिकता पर प्रश्नचिंह लगाने का बिल्कुल नहीं है और न यह साबित करने का कि शराब न पीने वाला कोई महान व्यक्ति होता है।बात बस इतनी सी है कि तमाम स्पष्टीकरणों के बावजूद शराब अपराधिक प्रवृति, आत्महत्या, घरेलू हिंसा, अवसाद, गृह क्लेश का बड़ा कारण है परंतु बौद्धिक जगत में और राजनीतिक गलियारों में जिस तरह इस सच्चाई पर मौन धारण किया जाता है वह कचोटता है।