भारत सरकार के इस सहासिक फैसले की जितनी प्रशंसा की जाए कम है| फैसले से ज्यादा प्रशंसा उस साहस की कि जानी चाहिए जिसने तत्कालिक कष्टों ओर हो-हल्ले की परवाह किये बिना देश की 86% मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया|
लेकिन प्रश्न ये है कि इस घोषणा के लिए समय का चुनाव किस आधार किया गया और बैंकिंग क्षेत्र की ढांचागत स्थितियों को, मुद्रा छपाई की व्यवस्था के लिए क्या होमवर्क किया गया था| प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार लम्बे समय से इसकी तैयारी कर रही थी और इस दिशा में बढ़ रही थी परन्तु ये लम्बी छलांग लगाने की जल्दबाजी का कारण समझ से परे है| लंबी छलांग इसलिए क्योंकि इस छलांग से दो पग बाधाओं को एक साथ लांघने का प्रयास किया गया है| एक तो वह नगद जो आम-जन के पास किसी भी रूप में था और दूसरा वो बेहिसाब धन जो धन कुबेरों ने स्टॉक किया हुआ था| ‘धनकुबेर’ की परिभाषा आम जन के लिए उतनी ही अस्पष्ट है जितनी ‘कालेधन’ की थी| तथाकथित ‘कालेधन’ के बारे में किसी ने नहीं सोचा था कि आटे के कनस्तर में रखे नोट या शगुन के लिफ़ाफ़े में दी गयी नगदी रातोंरात कालाधन बन जायेगी| इसी तरह जिन धन्ना सेठों की नींद उड़ने के उत्सव मनाये जा रहे हैं उनकी छवि भी काल्पनिक अधिक है| यथार्थ के धरातल पर जब हमें पता लगता है कि यह धन्ना सेठ कोई और नहीं वह परचूनिया है जिसने राममोहन को उधार देना बंद कर दिया है या वो सेठ जी हैं जो कल तक करोड़ों के मालिक लगते थे आज कह रहे हैं कि कल्लू तुझे देने के लिए सौ-सौ के नोट नहीं है तो महीने भर गाँव चला जा तब हमे लगता है कि ठगा तो वो राम मोहन और कल्लू गए हैं| धन्ना सेठ कतार में नहीं हैं| उनके लिए कल्लू के किसी पड़ोसी को बुला लिया गया है जो मजदूरी कतार में लगने की मजदूरी ले रहा है|
कालेधन के मुद्दे पर वर्तमान सरकार ने अबतक जो कदम उठाये थे वे बहुत प्रभावशाली परिणाम देने वाले नहीं रहे| यह कदम एक मास्टर स्ट्रोक था| नोटबंदी के बाद लगा कि इस दिशा में उठाये गए पूर्ववर्ती कदम इसकी भूमिका के लिए ही थे| नोटबंदी करने से पूर्व भारत सरकार ने कुछ समस्याओं का पुर्वानुमान लगा लिया होगा परन्तु बहुत अधिक प्रबंधन के बिना ‘देखा जाएगा’ वाले रवैये से काम किया गया| नि:संदेह गोपनीयता का एक ख़तरा था परन्तु भारत जैसे बड़े देश में 86% मुद्रा को बंद कर देने के लिए जिन बुनियादी चुनौतियों से निपटा जाना था उनके बारे में सरकार कोई ठोस रणनीति नहीं बना सकी| नोटबंदी केवल 500 और 1000 के नोट का बंद होना ही नहीं है यह विश्व की एक बटा सात आबादी को नगद रहित व्यापार की और धकेलने का और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को बैंक की नकेल पहनाने का भागरथी प्रयास भी है|
यह भाजपा की रणनीतिक जीत ही कही जायेगी कि नोटबंदी के खिलाफ सीधे-सीधे बोलने से विपक्षी पार्टियां भी बच रही हैं| विपक्षी नेता शादियों और लोगों की तकलीफ की दुहाई दे रहें हैं| इस सब के बीच जो बात समझ से परे है वह यह कि यदि सरकार को यह कदम उठाना था और लंबे समय से इस दिशा में कदम बढाये जा रहे थे तो कम से कम छोटे दुकानदारों की भलाई के लिए ‘नकद रहित व्यापार’ को प्रोत्साहित करने के लिए एक लंबा अभियान चलाया जा सकता था, जैसे जनधन के लिए किया गया| इससे छोटे व्यापारी के नुकसान को कम किया जा सकता था| प्रति शाखा नागरिकों के अनुपात को बेहतर किया जाना चाहिए था जो विकसित राष्ट्रों से बहुत कम है| किसानों के लिए बुआई का समय था और अधिकतर किसान नगद में ही लेन-देन करते हैं उन्हें नगद रहित व्यापार में प्रोत्साहित करने के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गयी| बड़े संस्थानों जैसे अस्पताल, स्कूल-कॉलेजों, धार्मिक ट्रस्ट आदि के लिए किसी भी प्रकार के नगद लेनदेन को पूर्णत: बैन किया जा सकता था| यह सब करने में कुछ समय लगता परन्तु कम से कम इस सरकार के पास समय और बहुमत का उतना अभाव नहीं था इसलिए इस ब्रह्मास्त्र को चलाने में जल्दबाजी दिखाने के कारण अप्रत्यक्ष अधिक लगते हैं|
यदि आदमी को अपने ही खाते में जमा किया धन आवश्यकता के समय नहीं मिलेगा तो आम आदमी अधिक इंतज़ार नहीं कर सकेगा और अराजकता बढ़ने का खतरा बढ़ता जाएगा| पता नहीं हमारे बैंककर्मी और बैंकिंग सिस्टम इस चुनौती के लिए कितना तैयार है लेकिन एक बात तय है कि यह परीक्षा उनसे ज्यादा उस आम जन की है जिससे प्रधानमंत्री ने 50 दिन का सहयोग माँगा है|