Sunday, 26 May 2019

बेरोजगारी को मात देती हिंदी

भूमंडलीकरण संचार साधनों की उंगली पकड़कर खड़ा हुआ, पूंजीवाद की घुट्टी पीकर बड़ा हुआ तो बाजार ने इसे अपने इशारे पर चलना सिखाया| बाजार केवल खरीदना और बेचना जानता है| बेचने के लिए उपभोक्ता को लुभाना आवश्यक है इसलिए मार्केटिंग जरूरी है| मार्केटिंग या प्रचार के लिए पहली शर्त है यू.एस.पी.(Unique Selling Point)। अगर न हो तो क्रियेट कीजिये| हाट में माल बेचना है तो खूबी तो बतानी ही पड़ेगी| क्रय-विक्रय के इस खेल में मतलब है तो सिर्फ अपने माल से और मुनाफे से| जो बेचा जा सकता है उसे खरीदना है और जो खरीदा जा सकता है उसे बेचना है| भूमंडलीकरण के इस दौर में एक देश के बाजार दूसरे देश के बाजार से जुड़ रहे हैं| अब तीसरी दुनिया की जनसंख्या भीड़ नहीं कंज्यूमर है| इसी को लक्ष्य करके मार्केटिंग या विपणन की तमाम रणनीति तैयार की जानी है| Target consumer की कोमल भावनाओं को भेदो। उसकी भाषा बोलो तभी माल बिकेगा| बस इसी तरह न चाहते हुए भी खरीद-बेच के ठीक बीच में आकर भाषा अपना वर्चस्व दिखा देती है|

यहाँ दो प्रक्रिया साथ-साथ घटित होती हैं - मुनाफे की भाषा और भाषा से मुनाफा | मुनाफे की भाषा माल बेचने वाला या माल का प्रचार करने वाला सीखता है जबकि उपभोक्ता के लिए यही अवसर होता है भाषा के माध्यम से धन बनाने का| जितना बड़ा उपभोक्ता वर्ग होगा उतना ही बाजार उत्सुक होगा उसकी भाषा सीखने के लिए। बाजार अपनी भाषा सीखा भी सकता है लेकिन यह एक धीमी प्रक्रिया है और बहुत से अन्य घटकों पर भी टिकी है| बाजार भाषा सीखने के लिए जितना उत्सुक होगा भाषा के प्रयोक्ताओं के लिए उतने ही अवसर उत्पन्न होंगे| विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा की लगभग सभी सूचियों में हिन्दी का स्थान कमोबेश प्रथम पांच में है| जबकि व्यापारिक दृष्टि से विश्व की 10 शीर्ष भाषाओं में हिन्दी को शामिल किये बिना सम्भवत: कोई सूची मुकम्मल नहीं होती| Top 100 Online Languages की बात करें तो हिन्दी के ऑनलाइन प्रयोग में 66% का उछाल देखा गया है| Global Content and Language Solution  द्वारा जारी एक सूची में व्यापार की दृष्टि से विश्व की  शीर्ष भाषाओं में हिन्दी को 10वें स्थान पर रखा गया है| इस लेख में बिजनेस मैनेजमेंट पर शोध करने वाली संस्था CSA के हवाले से लिखा गया है कि 88% भारतीय अंग्रेजी नहीं जानते|   अब इसी आंकड़े के साथ एक और आंकड़े को जोड़ देते हैं| Indian Readership Survey -2017 के अनुसार भारत में पढ़े जाने वाले शीर्ष 10 अखबारों में अंग्रेजी का एक भी नहीं है| इन सब आंकड़ों से एक बात तो स्पष्ट होती है कि हिन्दी मरती हुई नहीं बहुत तेजी से बढ़ती हुई भाषा है| ऐसा नहीं है कि इन भाषा के इस बढ़ते बाजार में केवल और केवल हिन्दी ज्ञान ही नौकरी के लिए पर्याप्त होगा लेकिन हिन्दी के विद्वानों को बाजार में भाव न मिले ऐसा सम्भव नहीं है|
रोजगार के जिन क्षेत्रों का विश्लेष्ण किया गया है वो रोजगार के परम्परागत क्षेत्रों (शिक्षण और अनुवाद) से पूरी तरह अलग हैं| इसी के साथ-साथ रचनात्मक लोगों के लिए टी.वी. और फिल्मों से इत्तर यू-ट्यूब और नेट सीरीज ने रचनात्मक लेखन को नये आयाम दिए हैं| मध्यवर्ग की बढ़ती क्रय शक्ति ने डोमेस्टिक कॉल सेंटर क्षेत्र का नया क्षेत्र अस्तित्व में आया है|डोमेस्टिक कॉल सेंटर भी हिंदी जानने वाले टेक फ्रेंडली किशोरों को नौकरी पर रखना  पसन्द करते हैं।

भाषा के विकास का सीधा-सम्बन्ध भाषा के लोगों के आर्थिक विकास से है| जैसे-जैसे हिन्दी पट्टी में मध्यवर्ग का दायरा और बढ़ेगा हिन्दी में रोजगार की सम्भावनाओं को भी पंख लगते जायेंगे| इससे केवल हिन्दीभाषी ही लाभान्वित नहीं होंगें बल्कि हिन्दी को जल्दी सीख लेने वाले गैर-हिन्दी भाषियों के लिए भी यह एक अतिरिक्त योग्यता बन चुकी है| वस्तुतः हिन्दीत्तर भाषियों के लिए हिन्दी सीखने का जैसा दबाव आज के दौर में बाजार से आया है वैसा पहले नहीं था| बिहार या बंगाल का मजदूर यदि चेन्नई में काम करता है तो राशन उस दुकान से लेना पसंद करेगा जो दुकानदार थोड़ी-बहुत हिन्दी बोलता या समझता हो| मैंने अपनी हिंदी का विस्तार पोस्ट में ये स्पष्ट किया है कि श्रम का बहाव उत्तर से दक्षिण की ओर अधिक है जिसके परिणाम 2011 की जनगणना में दक्षिण भारतीय राज्यों में भाषा परिवर्तन के रूप में दिखते हैं|

बेरोजगारी के इस दौर में भाषा के प्रति कट्टर होने की नहीं ग्राह्य होकर भाषा को जीविकोपार्जन का साधन बनाने की आवश्यकता है|