Friday, 22 July 2022

राष्ट्रीय हित के आगे

श्रीलंका गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा है। रूस द्वारा थोपे गए युद्ध के कारण, यूक्रेन युद्ध विभीषिका से जूझ रहा है। रूस की जनता भी युद्ध के कारण बढ़ी महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त है। पाकिस्तान आर्थिक दिवालिया होने की कगार पर है। चीन की आर्थिक आक्रामकता छोटे देशों के लिए खतरा बनी हुई है। 

वैश्वीकरण की व्यापक और लंबी प्रक्रिया राष्ट्रों को निकट तो ले आई है लेकिन जाने- अनजाने इसने विश्व को मुनाफाखोरी और आत्मतकेंद्रियता की ओर धकेला है। आज यह बात खुले तौर पर स्वीकार की जाती है कि अर्थ तंत्र और पर्यावरण के लिहाज से सभी राष्ट्र जुड़े हुए हैं। आर्थिक रूप से एक राष्ट्र के कमजोर पड़ जाने से अनेक राष्ट्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे ही पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन सभी राष्ट्रों के लिए चिंतन का विषय बना हुए है। कोरोना महामारी में भी हमने देखा कि कागज़ों पर खिंची काल्पनिक रेखाओं से मनुष्य के सुख-दुख बांटे नहीं जा सकते। इन काल्पनिक रेखाओं को जिन्हें हम राष्ट्र की भौगोलिक सीमा कहते हैं, जिनके भीतर कुछ लोग बैठ कर उसके भीतर रह रहे सभी लोगों के भाग्य विधाता होने का दंभ भरते हैं, भूमि के इन टुकड़ों की पहचान को बनाए रखने के लिए जो लोगों को उकसाते हैं, उन्हें अभी यह समझना होगा कि हम अपने कबीलों से बाहर, दूसरे कबीलों को भी हाशिए पर नहीं धकेल सकते, चाहे वह कितना ही दुर्बल हो। दुर्बल कबीले की भी जिम्मेदारी है कि वह अगल-बगल के सभी बड़े कबीले से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की प्रवृत्ति से बचें।

आज शोधकर्ता हमें बताते हैं कि पिछले कुछ समय से मानव संसाधन भी एक ऐसा ' उत्पाद' है, जो हमें साझा करना पड़ेगा। आर्थिक और सामाजिक रूप से विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर बहुत तेजी से घट रही है और उन्हें प्रशिक्षित और युवा मानव संसाधन को 'आयात' करना होगा। बहुत से पश्चिमी देशों ने प्रशिक्षित युवा वर्ग को अपने देशों में आमंत्रित करने के लिए नीतियां बनानी शुरू कर दी हैं। 

राष्ट्रों की एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यही समझा जाता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। लेकिन अब इस सिद्धांत में कुछ संशोधन की आवश्यकता है। वर्तमान हालात में मानवीय वैश्विक हितों को सर्वोपरि रखकर राष्ट्रीय हितों को उसका अनुगामी बनना होगा। 

इस सिद्धांत को सैद्धांतिक रूप से तो कुछ मान्यता मिलने भी लगी है लेकिन व्यवहारिक रूप में इसक सर्वथा अभाव दिखता है। यदि राष्ट्र के नीति नियंता थोड़ा भी गंभीर होकर इस सिद्धांत का अनुसरण करें तो निश्चित रूप से युद्धों को टाला जा सकता है, आर्थिक आक्रामकता रुक सकती है, जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।

Saturday, 20 March 2021

वॉल्ट डिज्नी :ऐनीमेशन का बादशाह




पुस्तक का नाम: वॉल्ट डिज्नी: ऐनीमेशन का बादशाह
लेखक: विजय शर्मा
समीक्षक : विपिन शर्मा 'अनहद'
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, दरिया गंज, नई दिल्ली
पृष्ठ संख्या: 284
मूल्य: 595/- (हार्ड बाउंड)



हिन्दी में रचनाधर्मिता का अर्थ उपन्यास, कहानी, कविता से लगाया जाता रहा है। इसका दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि हिन्दी पाठक और हिन्दी समाज के चिंतन दायरे तंग होते चले गए। विजय शर्मा का लेखन इसी यथास्थितिवादी मन:स्थिति और वैचारिकी को तोड़ता है। पाठक समुदाय के लिए सरहदों के पार की रचनात्मक खिड़की खोलता है। चिंतन की गहराई और विषय की व्यापक समझ उन्हें महत्वपूर्ण रचनाकार में परिवर्तित करती है। देश-दुनिया के साहित्य, इतिहास, सिनेमा पर विपुल लेखन इस बात का प्रमाण है। ताजगी और साफ़गोई उनकी विशेषता है।
विपिन शर्मा 

‘वॉल्ट डिज्नी: ऐनीमेशन का बादशाह’ विजय शर्मा की वाणी प्रकाशान से प्रकाशित पुस्तक है – यह न केवल वॉल्ट डिज्नी की जिंदगी का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात महाशक्ति के रूप में उभर रहे अमेरिका के बारे में भी तफ़्सील से बात करती है। लेखिका की व्यापक सोच, खुली दृष्टि की छाप पुस्तक के हर पृष्ठ पर दिखाई देती है। विश्व साहित्य एवं विश्व सिनेमा पर हम उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर पढ़ते रहे हैं। अपनी रचनात्मक जीवटता से उन्होंने दुनिया नापी है। जीवनी प्राय: उल्लखित व्यक्ति के जीवन का तथ्यात्मक ब्योरा बन कर रह जाती है। ‘वॉल्ट डिज्नी: ऐनीमेशन का बादशाह’ इस बात का अतिक्रमण करती है। अपनी पठनीयता से यह पाठक को बाँधती, जकड़ती है। एक प्रवाह और रवानगी है इस कृति में जो अद्योपांत पुस्तक को पढ़ने को विवश करती है। इसके साथ ही नए प्रकार की किताबों के उभर रहे नए पाठक वर्ग की जरूरतों को भी यह किताब पूर्ण करती है। 

किताब सात अध्यायों में विभक्त है – 1. बचपन, 2. संघर्ष, 3. वॉल्ट डिज्नी: प्रोपगंडा, 4. आदिम चिंतन और वॉल्ट डिज्नी, 5. वॉल्ट डिज्नी परिवार में, 6. वॉल्ट डिज्नी: एक विजनरी लीडर, 7. वॉल्ट डिज्नी: चुनिन्दा ऐनीमेशन फ़िल्में। परिशिष्ट के तहत वॉल्ट डिज्नी की चुनी हुई फ़िल्मों की सूचि दी गई है।

यह पुस्तक एक रचनाकार के बनने की प्रक्रिया को भी गहराई से विश्लेषित करती है। बचपन के संदर्भ ‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास एवं इजाडोरा डंकन की आत्मकथा में बड़ी सघनता से उभरे हैं। वल्ट डिज्नी के बचपन के बारे में पढ़ते हुए इजाडोरा का बचपन आँखों के आगे घूम जाता है, वॉल्ट के बचपन के बारे में लिखती हुई विजय शर्मा एक किस्सागो में रूपांतरित हो जाती हैं। वॉल्ट के बचपन में झेली यातनाएँ पाठक को विह्वल करती हैं। बाल मनोविज्ञान को लेखिका ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है। वॉल्ट डिज्नी का पिता इलियास डिज्नी अपने कैरियर में असफ़ल रहा। ऐसे लोग प्राय: जीवन से उदास हो जाते हैं और चिड़चिड़े भी। इलियास जरूरत से ज्यादा लालची और असुरक्षित था। इसी तरह से वॉल्ट डिज्नी अपने चाचा रॉबर्ट डिज्नी को अपना आदर्श मानने लगता है क्योंकि वह किसी भी तरह से सफ़लता प्राप्त करना जानता है। 

बचपन में वॉल्ट ने अखबार बाँट कर घार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में मदाद की। मिस्टर शेरवुड के यहाँ भी वॉल्ट ने काम किया। बचपन के संघर्ष का उसको बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है। शेरवुड उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है। शेरवुड की बात को वॉल्ट ने हमेशा अपने मन में रखा, ‘अपना अज्ञान मानने से कभी डरो मत।’ वॉल्ट ने अपनी गरीबी, संघर्ष से काफ़ी कुछ सीखा। वॉल्ट का फ़ौजी बनने का स्वप्न था। प्रत्यक्ष रूप से तो वह कभी फ़ौज में शामिल न हो पाया, हाँ, रेडक्रॉस के साथ जुड़ कर द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी फ़ौजियों की सहायता अवश्य की।

विजय शर्मा सिलसिलेवार वॉल्ट की जिंदगी के तमाम रेशों को खोलती हैं। यहाँ तक कि उसकी स्वबावगत कमजोरियों को भी। वॉल्ट के बड़बोलेपन को भी वे रेखांकित करती हैं। अपनी प्रेमिका का वह ‘अन्य’ से शादी करने के लिए हमेशा कोसता रहता है, मगर बिट्रिस ने पहले ही उसने सब स्पष्ट अकर दिया था। पिता की ज्यादतियों को वॉल्ट अतिरंजनापूर्ण प्रस्तुत करता है। बचपन के कसैले अनुभवों ने वॉल्ट को दृढ़ व्यक्ति के रूप में रूपांतरित किया, विजय शर्मा कहती है, 
वह प्रौढ़ता की दहलीज पर कदम रख चुका था। अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम था। उसे पक्का मालूम था कि वह जेली फ़ैक्टरी में काम नहीं करने वाला है। वह या तो एक्टर बनेगा अथवा चित्रकार। उसे यह भी मालूम था कि काम का मिलना आसान न होगा। वह आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हो चुका था।’ (पृष्ठ 63)

वॉल्ट को बचपन से ही समूह में रहना पसंद था। लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का कोई भी मौका वह नहीं छोड़ता था। पिता के विपरीत प्रसन्न रहना उसका स्वभाव था। इसी वजह से वह लोगों से घिरा रहता। वॉल्ट सातवीं कक्षा में था। पढ़ने में औसत मगर चित्रकारी में उत्कृष्ट। विदाई समारोह में बोलते हुए वॉल्ट के प्रिंसिपल ने कहा, ‘अगर आप चाहते है तो वह आपकी पेंटिंग बना सकता है।’ यह बता वॉल्ट को हमेशा स्मरण रही। एक कलाकार के रूप में स्वयं को स्थापित करने की वॉल्ट में हमेशा तीव्र इच्छा रही। पुस्तक का द्वितीय अध्याय, ‘संघर्ष’ है। इस अध्याय में विजय शर्मा वॉल्ट के जीवन के बहाने अमेरिका में पनप रहे पूँजीवाद एवं फोर्डवाद  की प्रवृति पर विस्तार से बात करती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात एकमात्र अक्षुण्ण शक्ति के रूप में अमेरिका ही बच गया था। स्वयं को औद्योगिक साम्राज्य का अगुआ बनाने के लिए वह कटिबद्ध था। वॉल्ट उत्साही अमेरिका के स्वप्न में निज स्वप्न मिला देता है।

इस अध्याय में वॉल्ट के कार्टूनिस्ट बनने के लिए की गई अथक मेहनत हमारे सामने प्रकट होती है। वह ‘स्टार’ समाचार पत्र के लिए कार्टून बनाता है। विजय शर्मा कहती हैं, 
‘वह पागल की तरह काम कर रहा था। उसमें सीखने की अदम्य भूख थी। वह कहीं से भी सीखने को तत्पर था। मन लायक काम हो तो वह शक्ति से ज्यादा मेहनत करता। एक बार पेसमेन ने उसे विज्ञापन का मुख पृष्ठ बनाने का आदेश दिया और शाम को वॉल्ट खीसें निपोरे अगला औएअ पिछला दोनों कवर बना कर खड़ा था।' (पृष्ठ 66) 

वॉल्ट ने अपने कार्टूनों में 1920 के आस-पास के जीवन को अपनी कार्टून कला का आधार बनाया। दुनिया (1920) कार्टून अत्यंत चर्चित हुआ। विश्वयुद्ध, शांति वार्ता, हड़ताल. चीनी की कमी. जैसे मुद्दे वॉल्ट की रेखांकन कला में उभरने लगे। एक बात और किताब पढ़ते हुए उभरती है, जीनियस लोग हमेशा जोखिम उठाने वाले औरे नवोन्मेषी होते हैं। वॉल्ट अब कार्टून में प्रयोग करना चाहता था। ऐनीमेशन की दुनिया उसे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। वहां मिलने वाला पैसा, माध्यम का तकनीकि आकर्षण आदि सब तत्व हमेशा उसके प्रिय रहे। शुरुआती दौर में ऐनीमेशन को ले कर कोई प्रशिक्षण संस्थान नहीं था। लेकिन वॉल्ट ने सिटी स्लाईड कंपनी में काम एवं अन्य माध्यमों से चीजें सीखने का प्रयास किया। वॉल्ट ने ‘न्यूमैन लाफ़ ओ ग्राम्स’ अपने कार्टूनों को नाम दिया। रोजमर्रा की जिंदगी से उठाए संदर्भ वॉल्ट को महत्वपूर्ण कलाकार के रूप में परिवर्तित करते हैं। वॉल्ट ने अपने कार्टूनों को फ़िल्म में रूपांतरित किया। वॉल्ट के बड़े भाई राय ने हमेशा वॉल्ट का साथ दिया। एक बार राय को टीबी हुई और उसे न्यू मैक्सिको के सान्ता सेनेटोरियम भेजा गया। राय को लगता यह उसके अंतिम दिन हैं मगर नियति को तो कुछ और मंजूर था। राय वॉल्ट का केवल भाई, बल्कि घनिष्ट मित्र और प्रेरक भी था।

वॉल्ट के जीवन का सूत्रवाक्य है, ‘कितना भी अच्छा हमें मिले, कितनी भी सफ़लता हमें मिल जाए, सर्वोत्तम आना अभी शेष है।’ (पृष्ठ 97) विजय शर्मा वॉल्ट के जीवन की तहों को खोलती हैं। रोचकता इस पुस्तक की खास विशेषता है। इस दौर में वॉल्ट के पास कापड़े और भोजन भी नहीं था, मगर इसी दौर मे उसने ‘ट्रामी टैक्कर ट्रूथ’ आदि फ़िल्में बनाईं।

पुस्तक का तीसरा अध्याय, ‘वॉल्ट डिज्नी: प्रोपगण्डा’ वॉल्ट के नाजीवाद विरोध एवं पूँजीवाद समर्थन में झुक जाने की व्याख्या करता है। वॉल्ट के कार्यालय में हड़ताल हुई, उसके विश्वासपात्र लोगों ने भी उसके खिलाफ़ झंडा बुलंद किया। वॉल्ट पर इसके असर को लेखिका ने बहुत बारीकी से उभारा है। वॉल्ट चिड़चिड़ा होता चला गया। इसी समय वॉल्ट ने सरकारी अनुदान पर फ़िल्म निर्माण किया। हिटलर का उपहास करने के लिए ‘डोनाल्ड इन नटजी लैंड’ बनाई। अमेरिका के हुक्मरानों को वायुसेना की महत्ता बातने के उद्देश्य से ‘विक्ट्री थ्रू एयर पावर’ बनाई। ‘बैम्बी’ अतियथार्थवादी ऐनीमेशन फ़िल्म थी। मच्छर नियंत्रण पर बनी ‘द विंग्ड स्कौज’ ने ‘गॉन विथ द विन्ड’ की लोकप्रियता को पीछे छोड़ दिया। वॉल्ट ने बड़े औद्योगिक घरानों के लिए विज्ञापन फ़िल्मों का निर्माण किया। कहने का अर्थ है यहाँ कला पर धन हावी हो गया।

वॉल्ट के जीवन पर तफ़्सील से बात करती हुई विजय शर्मा एक महत्वपूर्ण तथ्य पाठक से साझा करती हैं, 
‘अमेरिका में जो सबसे बड़ी चीज निर्यात की है वह है मनोरंजन, हँसी, प्रसन्नता। यह वह अपने जीवन के अंतिम क्षण तक करता रहा।’ वॉल्ट डिज्नी की साफ़गोई इस पुस्तक में प्रबलता से उभरती है। अंत समय तक भी लोग उसे कार्टूनिस्ट ही समझते रहे, इसी पदवी से नवाजते रहे। मगर खुद उसने एक बार कहा, ‘अब आजकल मैं केवल हस्ताक्षर, चेक काटने अथवा ऑटोग्राफ़ देने के लिए पेन या पेंसिल हाथ में उठाता हूँ।’ (पृष्ठ 135) 

यह जीवनी सिलसिलेवार चलती है, पढ़ने की ललक उत्पन्न करते हुए। ‘आदिम चिंतन और वॉल्ट डिज्नी’ चतुर्थ अध्याय है। इसमें वॉल्ट की सरहदों के पार फ़ैली लोकप्रियता, कला मर्मज्ञों द्वारा की गई प्रशंसा का वर्णन है। वॉल्ट यहाँ पर सिर्फ़ कार्टूनिस्ट ना हो कर मुक्ति की कामना के पैरोकार के रूप में उभरता है। ‘मिक्की माउस’ का सृजन कर अपने ही देश के हमनाम कवि वॉल्ट विटमैन की लोकप्रियता को अतिक्रमित कर जाता है। देश-दुनिया के सत्रह विश्वविद्यालयों द्वारा उसे मानद उपाधि प्रदान की जाती है, जिसे वह विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर देता है। वॉल्ट के जीवन के कई महत्वपूर्ण पक्ष उभरते हैं। पंचम अध्याय, ‘वॉल्ट डिज्नी परिवार में’ में लेखिका ने वॉल्ट के जीवन के तनावों, संघर्षों को पाठक से साझा किया है। विजय शर्मा बताती हैं कि वॉल्ट एकनिष्ठ पति, स्नेहिल, जिम्मेदार पिता एवं सहृदय भाई था। पिता और पुत्र के बीच द्वंद्व अवश्य रहा, मगर माता के प्रति उसका कोमल भाव था। राय डिज्नी और वॉल्ट के बीच हमेशा आत्मीय संबंध रहे।

‘वॉल्ट डिज्नी: एक विजनरी लीडर’ में विजय शर्मा वॉल्ट की मौलिकता का विश्लेषण करती हैं। वह एक बेहतरीन स्वप्न दृष्टा था उसने ‘डिज्नीलैंड’ के स्वप्न को साकार किया। वॉल्ट डिज्नी की बनाई फ़िल्म में ‘लिटिल पिग्स’ के गीत ‘हू इज अफ़्रेड ऑफ़ द बिग बैड वुल्फ़’ के माध्यम से अमेरिका को महामंदी से लड़ने का हौसला दिया।

अंतिम अध्याय ‘वॉल्ट डिज्नी: चुनिन्दा ऐनीमेशन फ़िल्में’ में वॉल्ट की महत्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में बात की गई है। ‘मिक्की माउस’, ‘बैम्बी’, ‘स्नो व्हाइट’ आदि। कुल मिला कर यह पुस्तक वॉल्ट डिज्नी की जीवनी तो है ही इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध एवं उसके आस-पास की ऐतिहासिक घटनाओं, फ़ासीवाद के उभार, अक्षुण्ण शक्ति के रूप में उभर रहे अमेरिका के आर्थिक एवं सांस्कृतिक ताने-बाने का गहरा कोलाज भी इस पुस्तक में उभरता है। अंत में कहना चाहूँगा यह हिन्दी का भी विस्तार है। कथात्मक साहित्य से इतर नए प्रकार के लेखन के लिए उभर रहे बाजार का भी सूचक है।


नोट : इस ब्लॉग में  अब आप भी अपने लेख  प्राकाशित  करवा सकते हैं| आपके  द्वारा लिखी  पुस्तक  समीक्षाएं और साहित्यिक लेख आमंत्रित हैं| अपनी रचनाएँ आप mail2rajeshdhanda@gmail.com पर भेज सकते हैं|  



Tuesday, 16 June 2020

भाषा का जीवन



मनुष्यों की तरह भाषा का भी एक जीवन होता है। भाषा भी जन्म लेती है, बड़ी होती है, युवा होती है। प्रौढ़ावस्था से होती हुई क्षीणकाय और दुर्बल होकर अपने अवसान तक पहुँचती है। प्रकट रूप से देखने पर ऐसा कहना मुश्किल लग सकता है  कि भाषा कौन-सी अवस्था में है परंतु भाषा के इतिहास, भूगोल, शब्दकोष, बोलने वालों की संख्या, साहित्य, साहित्येतर विषयों में भाषा का योगदान ऐसे उपादान हैं जिससे भाषा के जीवनकाल में चल रहे पड़ाव की पड़ताल करने में सहायता मिल सकती है।

हाल ही में भारत सरकार द्वारा कराये गये वृहद शोध से यह बात सामने आयी है कि भारत में 780 से अधिक भाषायें बोली जाती हैं और लगभग 66 लिपि प्रचलन में हैं।* जितना कठिन यह बताना है कि इन भाषाओं का जन्म कब हुआ होगा उतना ही दिलचस्प है यह समझना है कि इन भाषाओं की सेहत आज कैसी है और भविष्य के खतरों से निपटने के लिये वे कितनी तैयार हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस सर्वेक्षण में अरुणाचल प्रदेश को भाषिक विविधता के लिहाज से सर्वाधिक संपन्न प्रदेश पाया गया। साथ ही प्रति व्यक्ति भाषायी सघनता की बात करें तो पूर्वोत्तर भारत विश्व भर में भाषायी विविधता के सर्वाधिक संपन्न क्षेत्र की तरह उभरकर हमारे सामने आता है। इसका कारण है इस क्षेत्र में सालों से फलती-फूलती आयी अलग-अलग जनजातियाँ। इन भाषाओं के विकास के लिये क्या किया जा सकता है इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये। योगेन्द्र यादव के शब्दों में ‘भाषाओं का जो संघर्ष है वह सिर्फ सामाजिक आर्थिक बराबरी का संघर्ष नहीं है, यह मानव सभ्यता को बचाने का संघर्ष भी है|’^
मल्टी ब्रांड स्टोर में टंगी जैकट
 पर हिन्दी में लिखा 'डिस्क्लेमर'


प्रश्न यह है कि व्यवाहारिक तौर पर किस स्तर तक जाकर भाषा को संरक्षित किया जा सकता है। वह भी तब जब इनमें से अधिकतर भाषाओं को बोलने वालों की संख्या महज़ कुछ सैकड़ों में है। आदिवासी समाज की वर्तमान परिस्थितियों में यह और भी दुष्कर है क्योंकि इस समाज के सामने मुख्यधारा में मिलकर रोज़गार पाना, विस्थापन से बचना अथवा विस्थापन के संघर्षों से टकराकर अपनी भावी पीढ़ी को स्वावलंबी बनाना अधिक बड़ी चुनौतियाँ हैं। इस तनाव और दबाव के वातावरण में क्या कोई जाति या उसके वंशज अपनी भाषा को बचाये रखने के लिए क्या और कितना कुर्बान कर पायेगा|  अलास्का में कुछ यूपिक एस्कीमो समुदायों की भाषा 20 वर्षों में ही बूढ़ी पड़ गयी चूँकि वहाँ बच्चों ने अपनी पारंपरिक भाषा की जगह अंग्रेज़ी को चुना और सीखा।°

डॉ डवे के अनुसार ‘भाषा के लुप्त होने के लिये उसका छोटा होना आवश्यक नहीं है। यह भाषा की प्रकृति पर निर्भर करता है’।★
इस प्रकृति को समझने से बहुत कुछ स्पष्ट हो सकता है। यहां डवे लेटिन, ग्रीक और संस्कृत का उदहारण देते हैं। संस्कृत अपने विस्तृत और कठोर व्याकरण तथा द्विजों के एकाधिकार के कारण लोकव्यवहार से परे खिसक गयी। 

भाषाओं के विलुप्त हो जाने या प्रचलन से बाहर हो जाने के अनेक कारण हो सकते हैं। यह भी निश्चित है कि ऐसा रातों-रात नहीं होता पर इस प्रक्रिया में शताब्दियाँ लगे यह भी आवश्यक नहीं है।  ‘भाखा बहता नीर’ को वेद-वाक्य मानकर बस यह ध्यान देना आवश्यक है कि भाषा किस समय कितने कोण पर और किस रूप में और क्यों अपने प्रयोक्ता से दूर जा रही है। 

*डॉ डवे के आधीन 2011 से 2013 तक हुआ लिंगुइस्ट सर्वे ऑफ इंडिया 
^पृ-41, भाषा की राजनीति और राष्ट्रीय अस्मिता सं. ज्ञानतोष झा 
°Linguist Society of America. What is an Endangered Language- Anthony C. Woodburg
★blogs.reuters.com को दिया साक्षात्कार 

Friday, 20 March 2020

ये 'Quarantine' क्या होता है


ये 'Quarantine' क्या होता है ? शोले फिल्म में ऐसा ही एक संवाद था| एक हफ्ता पहले कितने ही 'देहातियों' ने मुझसे उसी शैली में ये सवाल किया| 😊




Quarantine (क्वारंटीन/क्वारंटाइन) शब्द बार-बार प्रयोग हो रहा है| कोरोना का प्रसंग हो तो मीडिया के अंग्रेजी और हिन्दी, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक सभी हलकों में इस शब्द की धूम है| Oxford Dictionary के अनुसार इसका शाब्दिक अर्थ है ‘a period of time when an animal or a person that has or may have a disease is kept away from others to prevent the disease from spreading.’ इस शब्द की उत्पत्ति इटली भाषा के Quarantina से मानी गयी है जिसका अर्थ है ‘चालीस दिन’ या Quaranta  अर्थात चालीस| जिस सन्दर्भ में इसका प्रयोग किया जा रहा है उसमें इससे सटीक शब्द नहीं हो सकता| शब्द ‘Isolation’ भी देखने को मिला लेकिन इसमें ‘अलग होने’ या ‘एकाकीपन’ का भाव है परन्तु उसका कारण बीमारी है ऐसा नहीं स्पष्ट होता| हिन्दी में इसके लिए क्या शब्द प्रयोग किया जाए| शब्दकोष में इसके लिए ‘संघरोध’ शब्द का प्रयोग है| आप कहेंगे इसे कौन समझ पाता| पर पहली बार सुनकर ‘क्वारंटीन’ कितने लोग समझ पाए थे? ‘संघ’ और ‘रोध’ से मिलकर बना ये शब्द क्या आम भारतीय के लिए समझना बहुत कठिन है| सभी जानते हैं कि ‘संघ’ से तात्पर्य ‘संगठन’, ‘समूह’ से हैं जबकि ‘रोध’ प्रत्यय वाले प्रतिरोध और  गतिरोध मीडिया में पहले से ही प्रचलित हैं| प्रिंट मीडिया वाले के लिए भी ‘क्वारंटीन’ से अधिक उपयुक्त ‘संघरोध’ होता क्योंकि यह कम जगह घेरता| फिर ‘क्वारंटीन’ शब्द के प्रयोग के पीछे क्या कारण हो सकता है?

मीडिया में बहुत-सी बार ऐसी स्थिति आती है कि समाचार इतनी तेजी से आता है कि समाचार चलाना प्राथमिकता होती है उसके लिए जो भी ‘प्रचलित’ शब्द मिले, प्रयोग कर लिया जाता है| यहाँ ‘प्रचलन’ पद विचारणीय है| ‘प्रचलन’ की प्रक्रिया को कौन समझ रहा है? कैसे समझ रहा है? इसके केंद्र में पाठक/श्रोता है या पत्रकार/संपादक का निजी व्यवहारिक अनुभव| अनुभवी संपादक समाचार की बारम्बारता (फ्रीक्वेंसी) और उसकी ‘महत्ता’ के आधार पर उसकी शब्दावली में आवश्यक परिवर्तन कर सकते अथवा करते हैं|

तो क्या दूसरी भाषा के शब्दों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए? बिलकुल किया जाना चाहिए| ऐसे शब्दों को जो लोक में रच-बस चुके हैं (जैसे सीलिंग, मार्केट) या ऐसे शब्दों को जो नये विषय से जुड़े हैं और पारिभाषिक है लेकिन ऐसे शब्द जिनके रूपांतरण मौजूद हैं और सर्वसुलभ हैं उन शब्दों को भी प्रयोग न करने का क्या कारण हो सकता है? आखिर किस आधार पर यह आंकलन किया जा रहा है कि ‘क्वारंटीन’ आमजन को समझ में आएगा और ‘संगरोध’ नहीं आएगा| ऐसा भी नहीं दिखा कि किसी भारतीय भाषा का कोई अन्य शब्द (‘एकांतवास’ सरीखा) को उन सन्दर्भों में प्रयोग करने का कोई प्रयास किया गया हो? कुछ समय पहले मैंने इण्डिया टीवी के रजत शर्मा को हिन्दी समाचार पढ़ते हुए ‘ब्रीच’ शब्द का प्रयोग करते हुए सुना| ये सुरक्षा में ‘ब्रीच’ का मामला था| क्या इसके लिए ‘सेंध’ प्रचलित शब्द नहीं है? यहाँ विषय  फिल्मी न्यूज़ या शेयर बाजार का नहीं है जहां कुछ छूट अपेक्षित मानी जा सकती है| ‘सर्वाधिक पढ़ा जाने’ का दावा करने वाले हिन्दी दैनिक अखबार आज ‘आइसोलेट’ और ‘क्वारंटीन’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं| 

कोई भी शब्द उठाकर जनता के मुंह पर दे मारिये क्योंकि आपके पास मीडिया की ताकत है और जनता की भाषा में गढ़े शब्दों की शक्ल आपको पसंद नहीं| ये आमजन के ऊपर अंग्रेजी थोपना नहीं तो क्या है| कोई समझाये कि इसे मीडिया के द्वारा अपने दायित्व की अनदेखी क्यों न समझा जाए|
                      

Thursday, 6 June 2019

जनता को हांकते हुक्मरान



पढ़े लिखे होने के नाते हम लोग यह आसानी से समझा जा सकता है कि 'हिंदी थोपने के नए अध्याय' के तहत जो कुछ हो रहा है चाहे केंद्र की तरफ से हो या राज्य की राजनीतिक पार्टियों की ओर से सब कुछ राजनीति है, कोरी राजनीति और इसके अलावा कुछ नहीं। केंद्र सरकार ने बिना कुछ सोचे-समझे त्रिभाषा के घिसे-पिटे सूत्र को बंद किताबों में से निकाल डाला। तमिलनाडु के सत्ताधीशों की ओर से हिंदी विरोध के लिए आक्रमकता अपेक्षित थी। लेकिन ए.आर. रहमान जैसे संगीतज्ञ का इस विवाद में कूदना यह बताने के लिए पर्याप्त है की भाषाई कट्टरता किस ओर तीव्रतर है। जबकि गनीमत रही कि हिंदी पट्टी के किसी नेता या अभिनेता ने अनावश्यक आक्रामकता नहीं दिखायी।


पूरे विमर्श में जिस बात को अनदेखा किया जा रहा है वह है; भाषा, मनुष्य को समाज और संस्कृति से जोड़ने के अलावा एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाती है। भाषा जीविकोपार्जन का माध्यम भी बन सकती है।भारत में अंग्रेजी सीखने का चलन इसीलिए बढ़ रहा है, ये सोच कितनी सही है ये दीगर बात है।

तमिलनाडु प्रवास के दौरान एक मजेदार बात पता चली। केरल की तर्ज पर वहाँ धड़ले से नर्सिंग स्कूल खोले गए पर मलयाली नर्सें इस क्षेत्र में सफल नौकरी पा सकीं लेकिन तमिल नर्सें सफल न हो सकी क्योंकि मलयाली नर्सें हिंदी से परिचित थी और उत्तर भारत में सामंजस्य बिठाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई जबकि तमिल नर्सें तमिलनाडु से बाहर निकलकर असहज महसूस करती थीं।

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि मैं कारैकुड़ी, दिंदुगल, तिरुनलवेली, तुत्तूकुड़ी जैसे ठेठ तमिल क्षेत्रों का दौरा कर चुका हूं और वहां पर मैंने 30 दिनों में हिंदी सीखें जैसे पोस्टर लगे हुए देखे। अब सोचने वाली बात यह है की विरोध के बाद भी यह कौन लोग हैं जो हिंदी सीखना चाहते हैं। स्पष्ट है कि यह विरोध ठीक उसी तरह का विरोध है जैसा 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी के लिए हुआ था। न कोई उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी को रोक सका न कोई तमिलनाडु में हिंदी को रोक सकेगा (क्योंकि बात रोजगार की है साहब)।

जैसे ही तमिल व्यक्ति तमिलनाडु से बाहर कदम रखता है वह नीति निर्धारकों को कोसना शुरू कर देता है जिसने उसे आज तक कभी हिंदी नहीं सीखने दी या हिंदी सीखने के पर्याप्त अवसर नहीं दिए। चेन्नई में पब्लिक स्कूल के अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन करके यह कहा कि उनके बच्चों को हिंदी सीखने के समान अवसर दिए जाएं। यह बात बड़ी खबर नहीं बन सकी और चेन्नई में बैठे हुए जिन कानों तक यह बात पहुंचनी चाहिए थी वहां पहुंच कर भी है अनसुनी ही रह गई।

एक बार एक तमिल व्यक्ति ने जो अपनी नौकरी से रिटायर होने वाला था मुझसे कहा कि वह हिंदी सीखना चाहता है। बात कुछ अटपटी लगी। बाद में उसने कारण बताया कि जब वह अपने बेटे के पास अमेरिका जाता है तो अपने आयु वर्ग के लोगों में शामिल होने का प्रयास करता है। वहां उपस्थित भारतीय समुदाय में सभी लोग चाहे वह गुजराती हों  मलयाली  हों, पंजाबी हों बिहारी हों केवल हिंदी में ही बात करते हैं और वो खुद को बहुत कटा कटा महसूस करता है।

Image Courtesy Pixabay 
इस प्रकरण से एक बात साफ है कि दिल्ली में बैठे हुक्मरान शिक्षा नीति को लेकर गम्भीर नहीं है। शिक्षा नीति में त्रिभाषा को डालना फिर आनन फानन में डैमेज कंट्रोल करते हुए उसे हटा लेना उनकी गम्भीरता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। लेकिन बेहद अफसोस के साथ ये भी कहना पड़ेगा कि तमिलनाडु सरकार ने तमिल लोगों को हिंदी सीखने के लिए बाजार के जिम्मे छोड़कर उनके साथ न्याय नहीं किया।



Sunday, 26 May 2019

बेरोजगारी को मात देती हिंदी

भूमंडलीकरण संचार साधनों की उंगली पकड़कर खड़ा हुआ, पूंजीवाद की घुट्टी पीकर बड़ा हुआ तो बाजार ने इसे अपने इशारे पर चलना सिखाया| बाजार केवल खरीदना और बेचना जानता है| बेचने के लिए उपभोक्ता को लुभाना आवश्यक है इसलिए मार्केटिंग जरूरी है| मार्केटिंग या प्रचार के लिए पहली शर्त है यू.एस.पी.(Unique Selling Point)। अगर न हो तो क्रियेट कीजिये| हाट में माल बेचना है तो खूबी तो बतानी ही पड़ेगी| क्रय-विक्रय के इस खेल में मतलब है तो सिर्फ अपने माल से और मुनाफे से| जो बेचा जा सकता है उसे खरीदना है और जो खरीदा जा सकता है उसे बेचना है| भूमंडलीकरण के इस दौर में एक देश के बाजार दूसरे देश के बाजार से जुड़ रहे हैं| अब तीसरी दुनिया की जनसंख्या भीड़ नहीं कंज्यूमर है| इसी को लक्ष्य करके मार्केटिंग या विपणन की तमाम रणनीति तैयार की जानी है| Target consumer की कोमल भावनाओं को भेदो। उसकी भाषा बोलो तभी माल बिकेगा| बस इसी तरह न चाहते हुए भी खरीद-बेच के ठीक बीच में आकर भाषा अपना वर्चस्व दिखा देती है|

यहाँ दो प्रक्रिया साथ-साथ घटित होती हैं - मुनाफे की भाषा और भाषा से मुनाफा | मुनाफे की भाषा माल बेचने वाला या माल का प्रचार करने वाला सीखता है जबकि उपभोक्ता के लिए यही अवसर होता है भाषा के माध्यम से धन बनाने का| जितना बड़ा उपभोक्ता वर्ग होगा उतना ही बाजार उत्सुक होगा उसकी भाषा सीखने के लिए। बाजार अपनी भाषा सीखा भी सकता है लेकिन यह एक धीमी प्रक्रिया है और बहुत से अन्य घटकों पर भी टिकी है| बाजार भाषा सीखने के लिए जितना उत्सुक होगा भाषा के प्रयोक्ताओं के लिए उतने ही अवसर उत्पन्न होंगे| विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा की लगभग सभी सूचियों में हिन्दी का स्थान कमोबेश प्रथम पांच में है| जबकि व्यापारिक दृष्टि से विश्व की 10 शीर्ष भाषाओं में हिन्दी को शामिल किये बिना सम्भवत: कोई सूची मुकम्मल नहीं होती| Top 100 Online Languages की बात करें तो हिन्दी के ऑनलाइन प्रयोग में 66% का उछाल देखा गया है| Global Content and Language Solution  द्वारा जारी एक सूची में व्यापार की दृष्टि से विश्व की  शीर्ष भाषाओं में हिन्दी को 10वें स्थान पर रखा गया है| इस लेख में बिजनेस मैनेजमेंट पर शोध करने वाली संस्था CSA के हवाले से लिखा गया है कि 88% भारतीय अंग्रेजी नहीं जानते|   अब इसी आंकड़े के साथ एक और आंकड़े को जोड़ देते हैं| Indian Readership Survey -2017 के अनुसार भारत में पढ़े जाने वाले शीर्ष 10 अखबारों में अंग्रेजी का एक भी नहीं है| इन सब आंकड़ों से एक बात तो स्पष्ट होती है कि हिन्दी मरती हुई नहीं बहुत तेजी से बढ़ती हुई भाषा है| ऐसा नहीं है कि इन भाषा के इस बढ़ते बाजार में केवल और केवल हिन्दी ज्ञान ही नौकरी के लिए पर्याप्त होगा लेकिन हिन्दी के विद्वानों को बाजार में भाव न मिले ऐसा सम्भव नहीं है|
रोजगार के जिन क्षेत्रों का विश्लेष्ण किया गया है वो रोजगार के परम्परागत क्षेत्रों (शिक्षण और अनुवाद) से पूरी तरह अलग हैं| इसी के साथ-साथ रचनात्मक लोगों के लिए टी.वी. और फिल्मों से इत्तर यू-ट्यूब और नेट सीरीज ने रचनात्मक लेखन को नये आयाम दिए हैं| मध्यवर्ग की बढ़ती क्रय शक्ति ने डोमेस्टिक कॉल सेंटर क्षेत्र का नया क्षेत्र अस्तित्व में आया है|डोमेस्टिक कॉल सेंटर भी हिंदी जानने वाले टेक फ्रेंडली किशोरों को नौकरी पर रखना  पसन्द करते हैं।

भाषा के विकास का सीधा-सम्बन्ध भाषा के लोगों के आर्थिक विकास से है| जैसे-जैसे हिन्दी पट्टी में मध्यवर्ग का दायरा और बढ़ेगा हिन्दी में रोजगार की सम्भावनाओं को भी पंख लगते जायेंगे| इससे केवल हिन्दीभाषी ही लाभान्वित नहीं होंगें बल्कि हिन्दी को जल्दी सीख लेने वाले गैर-हिन्दी भाषियों के लिए भी यह एक अतिरिक्त योग्यता बन चुकी है| वस्तुतः हिन्दीत्तर भाषियों के लिए हिन्दी सीखने का जैसा दबाव आज के दौर में बाजार से आया है वैसा पहले नहीं था| बिहार या बंगाल का मजदूर यदि चेन्नई में काम करता है तो राशन उस दुकान से लेना पसंद करेगा जो दुकानदार थोड़ी-बहुत हिन्दी बोलता या समझता हो| मैंने अपनी हिंदी का विस्तार पोस्ट में ये स्पष्ट किया है कि श्रम का बहाव उत्तर से दक्षिण की ओर अधिक है जिसके परिणाम 2011 की जनगणना में दक्षिण भारतीय राज्यों में भाषा परिवर्तन के रूप में दिखते हैं|

बेरोजगारी के इस दौर में भाषा के प्रति कट्टर होने की नहीं ग्राह्य होकर भाषा को जीविकोपार्जन का साधन बनाने की आवश्यकता है|  


Thursday, 28 February 2019

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय का परिचय



हिन्दी की सरकारी व्यवस्था को समझने के लिए क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के बारे में जानना बहुत जरूरी है| राजभाषा विभाग के अंतर्गत चार कार्यालय आते हैं| केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, क्षेत्रीय कार्यान्वयन  कार्यालय, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान और संसदीय समिति सचिवालय| इस लेख में क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के बारे में संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास किया गया है| क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय (क्षे.का.का.) राजभाषा विभाग के अधीन कार्य करतें हैं| राजभाषा विभाग कुल 8 क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालयों द्वारा सभी नराकास के संपर्क में रहता है|

क्र सं.
कार्यालय
क्षेत्र
1.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पश्चिम)
महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, दमन दीव, दादरा एवं नागर हवेली
2.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (मध्य)
मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़
3.       
उत्तरी क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय-। (दिल्ली)
दिल्ली एवं संघ राज्य क्षेत्र, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर
4.       
उत्तरी क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय-।।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड
5.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पूर्व)
    पश्चिम बंगाल, उड़ीसा
    बिहार, झारखण्ड
अण्डमान एवं निकोबार
6.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (दक्षिण)
   आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक
7.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पूर्वोत्तर)
    असम, मिजोरम, नागालैण्डमणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा
    सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश
8.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (दक्षिण-पश्चिम)
   केरल, तमिलनाडु
   पुदुच्चेरी, लक्षद्वीप

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के मुख्य कार्य

1.       नराकास का मार्गदर्शन

केन्द्रीय सरकार का प्रत्येक कार्यालय नगर स्तर पर नगर राजभाषा कार्यन्वयन (नराकास) समिति का भी सदस्य होता है| यह समिति नगर के कार्यालयों को राजभाषा नीति के क्रियान्वयन के लिए प्रोत्साहित करती है| नराकास के लिए अलग से कोई कार्यालय या स्टाफ नहीं होता| नराकास का कार्य किसी बड़े कार्यालय को अतिरिक्त दायित्व के रूप में सौंपा जाता है| अर्थात कि उत्तरदायी कार्यालय विभाग के नियमित कार्यालयों के अतिरिक्त नराकास के दायित्वों को भी वहन करेगा| नगर का वरिष्ठम अधिकारी इसका अध्यक्ष होता है और कार्यदायी संस्थान में तैनात हिन्दी कैडर का कार्मिक इसका पड़ें सदस्य सचिव होता है|  नराकास वर्ष में दो बैठक का आयोजन करता है| महानगरों में एक से अधिक नराकास भी हो सकते हैं, जैसे एक नराकास बैंकों और वित्तीय संस्थायों के लिए और एक अन्य सरकारी कार्यालयों के लिए| समान्यत: एक नराकास के अंतर्गत 50 से अधिक कार्यालय नहीं होते| नराकास के कार्यकलापों पर क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय नज़र रखते हैं| क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालयों के अधिकारी छमाही में आयोजित होने वाली नराकास बैठकों में भी शामिल होते हैं| इन बैठकों में केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों के कार्यालय प्रमुखों की उपस्थिति अनिवार्य है, कार्यालय प्रमुख के साथ-साथ हिन्दी संवर्ग के कार्मिक भी इन बैठकों में प्राय: उपस्थित रहते हैं| अत: यह कहा जा सकता है कि नराकास के माध्यम से क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय केन्द्रीय सरकार के अधीन सभी कार्यालयों, विभागों, उपक्रमों, स्वायत्त संस्थानों, बैंकों, अन्य वित्तीय संस्थानों में हो रहे राजभाषा क्रियान्वयन के कामों पर नजर रखते है|   

2.       सरकारी कार्यालयों का निरीक्षण

क्षे.का.का. केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों का (चाहे वह शाखा कार्यालय हो, आंचलिक या क्षेत्रीय कार्यालय हो, मुख्य कार्यालय हो, मुख्यालय हो) राजभाषा सम्बन्धी निरीक्षण करता है| निरीक्षण के दौरान मिलने वाली कमियों को कार्यालय प्रमुख के संज्ञान में लाता है| निरीक्षण की रिपोर्ट आलोच्य कार्यालय के मुख्यालय कार्यालय को भी भेजी जाती है| इसके अतिरिक्त क्षे.का.का. राज्य स्तर पर राजभाषा सम्बन्धी पुरस्कारों के वितरण के लिए भव्य आयोजन भी कराता है| इस तरह क्षे.का.का. का कार्य बहुत विशाल और चुनौतीपूर्ण है| विडम्बना यह है कि इसकी भूमिका को बहुत नगण्य समझा गया और इन कार्यालयों को उतना महत्व नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था या कभी इनकी क्षमताओं को समझा ही नहीं गया| जब इनकी परिकल्पना की गयी तभी इनकी संख्या निश्चित कर दी गयी| तब से अब तक केवल 8 क्षे.का.का. ही हैं| कार्यक्षेत्र की बात करें तो एक-एक क्षे.का.का. के अंतर्गत अनेक प्रदेश हैं| जिस प्रकार पिछले कुछ समय में नराकास (नगर राजभाषा कार्यन्वयन समिति) नराकास को सीमित करने के प्रयास हुए हैं क्या इस प्रकार क्षे.का.का. के अंतर्गत आने वाली नराकास को सीमित करने के प्रयास भी नहीं होने चाहियें| उत्तर प्रदेश, जैसे बड़े राज्य और उत्तराखंड के लिए एक ही क्षे.का.का. का होना न केवल उसकी कार्य-क्षमता को सीमित करता है बल्कि समय-समय पर होने वाले निरीक्षणों के अभाव में राजभाषा क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया को भी ढुलमुल बना देता है| भोगौलिक दृष्टि से अति विस्तारित होने के कारण भी मुट्ठी भर अधिकारियों के लिए सभी नराकास के अंतर्गत आने वाले कार्यालयों का निरीक्षण करना बहुत कठिन हो जाता है| यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि निरीक्षण के अलावा क्षे.का.का. केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों से कोई सीधे संपर्क या संवाद नहीं करता जबकि व्यापक दृष्टि से क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले सभी केन्द्रीय कार्यालयों को राजभाषा कार्यन्वयन के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने का दायित्व क्षे.का.का. का है| क्षे.का.का. अपनी सीमित स्टाफ संख्या के चलते बहुत सीमित कार्यालयों के निरीक्षण ही कर पाते हैं| निरीक्षण के दौरान पायी गयी कमियों को ठीक कराने के लिए होने वाली अनुवर्ती कार्रवाई की औपचारिकता भी बमुश्किल ही हो पाती हैं|