Sunday, 13 January 2019

रिलैक्स ! हिन्दी अनिवार्य नहीं है |


प्रकाश जावड़ेकर जी ने कह ही दिया कि आठवीं कक्षा तक कोई एक भाषा अनिवार्य करने की कोई योजना नहीं है| इसी के साथ हिन्दी को अनिवार्य करने की सारी अटकलों पर विराम लग गया|  

चुनावी मौसम की खुमारी और अखिल भारतीय होती पार्टी से ये ही उम्मीद की जा सकती है| लेकिन हमारे कुछ राष्ट्रवादी मित्र, जो विदेशों में हिन्दी में दिए गये प्रधानमंत्री के भाषण से मंत्रमुग्ध थे, उनको अवश्य धक्का लगा होगा| वो सोचे बैठे थे कि हिन्दी की जो प्रगति होनी है वह इसी सरकार के कार्यकाल में होनी है| 

समस्या ये ही है, हम सरकारों से बहुत अधिक अपेक्षा करने लगते हैं लेकिन लोकतंत्र में सरकार के किसी भी निर्णय के तीन आधार होते हैं – वोटबैंक, वोटबैंक और वोटबैंक| सत्ता शास्त्रीय सिद्धांतों से नहीं चलती वो तो समाजिक समस्याओं की आड़ में अपने स्वार्थ के वशीभूत कोई निर्णय लेती है और उसे जनतांत्रिक मूल्यबोध का चोला पहना देती हैं| लोकतंत्र की समस्याएं भी इतनी तरल और सरल होती हैं कि समय के साथ खुद ही ढीली पड़ जाती हैं| मीडिया की तमाम कोशिशों के बावजूद आज राम जन्म भूमि उन्माद का विषय नहीं है| जनसंख्या की समस्या को लेकर पूरा विमर्श ही बदल गया है| अब इसे सरलीकृत रूप से मानव संसाधन की चुनौती समझा जा रहा है| इसी प्रकार ‘भाषा’ भी अब विद्वेष का साधन नहीं रह गयी है, बस सरकार उसे थोपने से बचे| ‘राजभाषा’ को लेकर जो राजनीति 60 और 70 के दशक में हुई वह आज की पीढी के लिए हास्यास्पद ही होगी|
ऐसे सभी निर्णय दीर्घकालिक रूप से हिन्दी के पक्ष में ही गये हैं| जब सुदूर दक्षिण और उत्तर पूर्व के सूबों में हिन्दी लगातार बढ़ रही है तो स्पष्ट है कि तमाम राजकीय अवरोध भी हिन्दी के विस्तार को रोकने में बोने सिद्ध हुए हैं| भाषा को लेकर राजकीय कट्टरता की कलई खुलने का एक मजेदार किस्से बताता हूँ| उत्तर भारत में केरल की नर्सों की बढ़ती मांग को देखकर केरल सरकार का अनुकरण करते हुए तमिलनाडु सरकार ने भी निर्णय लिया कि अपने यहां नर्सिंग इंडस्ट्री को पल्लवित-पोषित किया जाए| ताबड़तोड़ नर्सिंग कॉलेज खोले गये| लेकिन कुछ समय बाद यह पाया गया कि तमिल नर्सों को वो सफलता नहीं मिल रही है और तमिलनाडु में नर्सों को उतना वेतन नहीं मिल रहा जिसकी वो हकदार है| सरकार के निर्णय पर उंगलियाँ उठना स्वभाविक था| गहन जांच-पड़ताल कराई गयी जिसके बाद पाया गया कि केरल की नर्से इसलिए सफल हो पायीं क्योंकि वे हिन्दी समझ या बोल पा रही थी| मलयाली के साथ-साथ हिन्दी बोलने या सुनने के कारण उन्हें उत्तर भारत में सामंजस्य बैठने में अधिक कठिनाई नहीं हुई जबकि तमिलनाडु में राजनैतिक विरोध के चलते हिन्दी से वंचित युवावर्ग न तो हिन्दी भाषा सीख सका न तमिलनाडु के बाहर सफल हो सका|  
       केंद्र सरकार ने हिन्दी को अनिवार्य न करके अनावश्यक टकराव से बचने की कोशिश की है| हमसे तो आधिकारिक रूप से यह भी नहीं कहा गया कि अंग्रेजी अनिवार्य है| जिस प्रकार अंग्रेजी को सीखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वातावरण प्रेरित करता है उसी प्रकार राष्ट्रीय परिवेश हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करता है| समय की मांग यही है कि गैर-हिन्दीभाषी राज्य अपने राज्य के लोगों के लिए हिन्दी सीखने के सहज अवसर उपलब्ध करवाएं| अब राज्यों की बारी है कि वो अपना दायित्व निभाएं अन्यथा हमारे गैर-हिन्दी भाषी मित्र स्वयं को मुख्यधारा से विलग मानते रहेंगे| 
       केंद्र सरकार लाख कहे कि हिन्दी अनिवार्य नहीं है पर लोग सीखेंगे कयोंकि लोग बाजार की हवा देखते हैं सरकारी फतवे नहीं|