Thursday, 28 February 2019

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय का परिचय



हिन्दी की सरकारी व्यवस्था को समझने के लिए क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के बारे में जानना बहुत जरूरी है| राजभाषा विभाग के अंतर्गत चार कार्यालय आते हैं| केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, क्षेत्रीय कार्यान्वयन  कार्यालय, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान और संसदीय समिति सचिवालय| इस लेख में क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के बारे में संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास किया गया है| क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय (क्षे.का.का.) राजभाषा विभाग के अधीन कार्य करतें हैं| राजभाषा विभाग कुल 8 क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालयों द्वारा सभी नराकास के संपर्क में रहता है|

क्र सं.
कार्यालय
क्षेत्र
1.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पश्चिम)
महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, दमन दीव, दादरा एवं नागर हवेली
2.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (मध्य)
मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़
3.       
उत्तरी क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय-। (दिल्ली)
दिल्ली एवं संघ राज्य क्षेत्र, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर
4.       
उत्तरी क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय-।।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड
5.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पूर्व)
    पश्चिम बंगाल, उड़ीसा
    बिहार, झारखण्ड
अण्डमान एवं निकोबार
6.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (दक्षिण)
   आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक
7.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पूर्वोत्तर)
    असम, मिजोरम, नागालैण्डमणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा
    सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश
8.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (दक्षिण-पश्चिम)
   केरल, तमिलनाडु
   पुदुच्चेरी, लक्षद्वीप

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के मुख्य कार्य

1.       नराकास का मार्गदर्शन

केन्द्रीय सरकार का प्रत्येक कार्यालय नगर स्तर पर नगर राजभाषा कार्यन्वयन (नराकास) समिति का भी सदस्य होता है| यह समिति नगर के कार्यालयों को राजभाषा नीति के क्रियान्वयन के लिए प्रोत्साहित करती है| नराकास के लिए अलग से कोई कार्यालय या स्टाफ नहीं होता| नराकास का कार्य किसी बड़े कार्यालय को अतिरिक्त दायित्व के रूप में सौंपा जाता है| अर्थात कि उत्तरदायी कार्यालय विभाग के नियमित कार्यालयों के अतिरिक्त नराकास के दायित्वों को भी वहन करेगा| नगर का वरिष्ठम अधिकारी इसका अध्यक्ष होता है और कार्यदायी संस्थान में तैनात हिन्दी कैडर का कार्मिक इसका पड़ें सदस्य सचिव होता है|  नराकास वर्ष में दो बैठक का आयोजन करता है| महानगरों में एक से अधिक नराकास भी हो सकते हैं, जैसे एक नराकास बैंकों और वित्तीय संस्थायों के लिए और एक अन्य सरकारी कार्यालयों के लिए| समान्यत: एक नराकास के अंतर्गत 50 से अधिक कार्यालय नहीं होते| नराकास के कार्यकलापों पर क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय नज़र रखते हैं| क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालयों के अधिकारी छमाही में आयोजित होने वाली नराकास बैठकों में भी शामिल होते हैं| इन बैठकों में केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों के कार्यालय प्रमुखों की उपस्थिति अनिवार्य है, कार्यालय प्रमुख के साथ-साथ हिन्दी संवर्ग के कार्मिक भी इन बैठकों में प्राय: उपस्थित रहते हैं| अत: यह कहा जा सकता है कि नराकास के माध्यम से क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय केन्द्रीय सरकार के अधीन सभी कार्यालयों, विभागों, उपक्रमों, स्वायत्त संस्थानों, बैंकों, अन्य वित्तीय संस्थानों में हो रहे राजभाषा क्रियान्वयन के कामों पर नजर रखते है|   

2.       सरकारी कार्यालयों का निरीक्षण

क्षे.का.का. केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों का (चाहे वह शाखा कार्यालय हो, आंचलिक या क्षेत्रीय कार्यालय हो, मुख्य कार्यालय हो, मुख्यालय हो) राजभाषा सम्बन्धी निरीक्षण करता है| निरीक्षण के दौरान मिलने वाली कमियों को कार्यालय प्रमुख के संज्ञान में लाता है| निरीक्षण की रिपोर्ट आलोच्य कार्यालय के मुख्यालय कार्यालय को भी भेजी जाती है| इसके अतिरिक्त क्षे.का.का. राज्य स्तर पर राजभाषा सम्बन्धी पुरस्कारों के वितरण के लिए भव्य आयोजन भी कराता है| इस तरह क्षे.का.का. का कार्य बहुत विशाल और चुनौतीपूर्ण है| विडम्बना यह है कि इसकी भूमिका को बहुत नगण्य समझा गया और इन कार्यालयों को उतना महत्व नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था या कभी इनकी क्षमताओं को समझा ही नहीं गया| जब इनकी परिकल्पना की गयी तभी इनकी संख्या निश्चित कर दी गयी| तब से अब तक केवल 8 क्षे.का.का. ही हैं| कार्यक्षेत्र की बात करें तो एक-एक क्षे.का.का. के अंतर्गत अनेक प्रदेश हैं| जिस प्रकार पिछले कुछ समय में नराकास (नगर राजभाषा कार्यन्वयन समिति) नराकास को सीमित करने के प्रयास हुए हैं क्या इस प्रकार क्षे.का.का. के अंतर्गत आने वाली नराकास को सीमित करने के प्रयास भी नहीं होने चाहियें| उत्तर प्रदेश, जैसे बड़े राज्य और उत्तराखंड के लिए एक ही क्षे.का.का. का होना न केवल उसकी कार्य-क्षमता को सीमित करता है बल्कि समय-समय पर होने वाले निरीक्षणों के अभाव में राजभाषा क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया को भी ढुलमुल बना देता है| भोगौलिक दृष्टि से अति विस्तारित होने के कारण भी मुट्ठी भर अधिकारियों के लिए सभी नराकास के अंतर्गत आने वाले कार्यालयों का निरीक्षण करना बहुत कठिन हो जाता है| यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि निरीक्षण के अलावा क्षे.का.का. केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों से कोई सीधे संपर्क या संवाद नहीं करता जबकि व्यापक दृष्टि से क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले सभी केन्द्रीय कार्यालयों को राजभाषा कार्यन्वयन के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने का दायित्व क्षे.का.का. का है| क्षे.का.का. अपनी सीमित स्टाफ संख्या के चलते बहुत सीमित कार्यालयों के निरीक्षण ही कर पाते हैं| निरीक्षण के दौरान पायी गयी कमियों को ठीक कराने के लिए होने वाली अनुवर्ती कार्रवाई की औपचारिकता भी बमुश्किल ही हो पाती हैं|

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