मनुष्यों की तरह भाषा का भी एक जीवन होता है। भाषा भी जन्म लेती है, बड़ी होती है, युवा होती है। प्रौढ़ावस्था से होती हुई क्षीणकाय और दुर्बल होकर अपने अवसान तक पहुँचती है। प्रकट रूप से देखने पर ऐसा कहना मुश्किल लग सकता है कि भाषा कौन-सी अवस्था में है परंतु भाषा के इतिहास, भूगोल, शब्दकोष, बोलने वालों की संख्या, साहित्य, साहित्येतर विषयों में भाषा का योगदान ऐसे उपादान हैं जिससे भाषा के जीवनकाल में चल रहे पड़ाव की पड़ताल करने में सहायता मिल सकती है।
हाल ही में भारत सरकार द्वारा कराये गये वृहद शोध से यह बात सामने आयी है कि भारत में 780 से अधिक भाषायें बोली जाती हैं और लगभग 66 लिपि प्रचलन में हैं।* जितना कठिन यह बताना है कि इन भाषाओं का जन्म कब हुआ होगा उतना ही दिलचस्प है यह समझना है कि इन भाषाओं की सेहत आज कैसी है और भविष्य के खतरों से निपटने के लिये वे कितनी तैयार हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस सर्वेक्षण में अरुणाचल प्रदेश को भाषिक विविधता के लिहाज से सर्वाधिक संपन्न प्रदेश पाया गया। साथ ही प्रति व्यक्ति भाषायी सघनता की बात करें तो पूर्वोत्तर भारत विश्व भर में भाषायी विविधता के सर्वाधिक संपन्न क्षेत्र की तरह उभरकर हमारे सामने आता है। इसका कारण है इस क्षेत्र में सालों से फलती-फूलती आयी अलग-अलग जनजातियाँ। इन भाषाओं के विकास के लिये क्या किया जा सकता है इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये। योगेन्द्र यादव के शब्दों में ‘भाषाओं का जो संघर्ष है वह सिर्फ सामाजिक आर्थिक बराबरी का संघर्ष नहीं है, यह मानव सभ्यता को बचाने का संघर्ष भी है|’^
प्रश्न यह है कि व्यवाहारिक तौर पर किस स्तर तक जाकर भाषा को संरक्षित किया जा सकता है। वह भी तब जब इनमें से अधिकतर भाषाओं को बोलने वालों की संख्या महज़ कुछ सैकड़ों में है। आदिवासी समाज की वर्तमान परिस्थितियों में यह और भी दुष्कर है क्योंकि इस समाज के सामने मुख्यधारा में मिलकर रोज़गार पाना, विस्थापन से बचना अथवा विस्थापन के संघर्षों से टकराकर अपनी भावी पीढ़ी को स्वावलंबी बनाना अधिक बड़ी चुनौतियाँ हैं। इस तनाव और दबाव के वातावरण में क्या कोई जाति या उसके वंशज अपनी भाषा को बचाये रखने के लिए क्या और कितना कुर्बान कर पायेगा| अलास्का में कुछ यूपिक एस्कीमो समुदायों की भाषा 20 वर्षों में ही बूढ़ी पड़ गयी चूँकि वहाँ बच्चों ने अपनी पारंपरिक भाषा की जगह अंग्रेज़ी को चुना और सीखा।°
डॉ डवे के अनुसार ‘भाषा के लुप्त होने के लिये उसका छोटा होना आवश्यक नहीं है। यह भाषा की प्रकृति पर निर्भर करता है’।★
इस प्रकृति को समझने से बहुत कुछ स्पष्ट हो सकता है। यहां डवे लेटिन, ग्रीक और संस्कृत का उदहारण देते हैं। संस्कृत अपने विस्तृत और कठोर व्याकरण तथा द्विजों के एकाधिकार के कारण लोकव्यवहार से परे खिसक गयी।
भाषाओं के विलुप्त हो जाने या प्रचलन से बाहर हो जाने के अनेक कारण हो सकते हैं। यह भी निश्चित है कि ऐसा रातों-रात नहीं होता पर इस प्रक्रिया में शताब्दियाँ लगे यह भी आवश्यक नहीं है। ‘भाखा बहता नीर’ को वेद-वाक्य मानकर बस यह ध्यान देना आवश्यक है कि भाषा किस समय कितने कोण पर और किस रूप में और क्यों अपने प्रयोक्ता से दूर जा रही है।
*डॉ डवे के आधीन 2011 से 2013 तक हुआ लिंगुइस्ट सर्वे ऑफ इंडिया
^पृ-41, भाषा की राजनीति और राष्ट्रीय अस्मिता सं. ज्ञानतोष झा
°Linguist Society of America. What is an Endangered Language- Anthony C. Woodburg
★blogs.reuters.com को दिया साक्षात्कार

बहुत बढ़िया भाई। बस दो तीन शब्दों की वर्तनी ठीक कर दीजिए। लाईन 5 लि? उपदान - उपादान।
ReplyDeleteशोधपरक।
सुधार के लिए शुक्रिया मित्र।
Deleteविचारपूर्ण आलेख है राजेश जी। संस्कृत भाषा समाप्त नहीं हुई, रूप बदलकर भारतीय भाषाओं के तौर पर मौजूद है। भाषाओं के इतिहास में कुछ सौ वर्ष का समय ज्यादा बड़ा नहीं होता। भारतीय भाषाएं जब भी अपना मूल तलाशेंगी, संस्कृत में ही जाकर उनकी यात्रा पूरी होगी।
ReplyDeleteधन्यवाद सर। संस्कृत के विषय में क्या खूब कहा आपने।
Deleteहिंदी भाषा के प्रति आपका लगाव बहुत ही प्रशंसनीय है !
ReplyDeleteहिंदी मेरी महबूबा है।☺️
Deleteबहुत सुंदर राजेश जी। संस्कृत के अादिकवि वाल्मीकिजी, महाभारत रचयिता वेदव्यासजी, मनुस्मृति के रचयिता मनुजी, नीतिशास्त्रकार भर्तृहरि तो गैर ब्राह्मण ही थे, सो मुझे संस्कृत को मिटाना तो भारतीय संस्कृति को मिटाने का मैकाले का षड़यंत्र ज़्यादा लगता है, और संस्कृत अंग्रेजी की तरह धनार्जन की ओर लक्षित नहीं थी।
ReplyDeleteमित्र डॉ डवे बड़े विज्ञ हैं मैंने उन्हीं की बात रखी है। इतना तो मानना पड़ेगा कि मैकाले के आने से काफी पहले संस्कृत लोक से विदा ले चुकी थी।
Deleteबहुत सुन्दर विवेचना । साधुवाद।।
ReplyDeleteइस वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में ,जब की देश देशांतर में भारी गतिरोध व्याप्त है , ऐसे में हिंदी को पर्याप्त स्थान, कद और महत्व अब भी मिले तो हिंदी और उससे मिलती जुलती भाषाओं, बोलियों द्वारा लगभग आधे से अधिक भौगोलिक जनसांख्यिक भारत का सफल व सकल प्रतिनिधित्व सम्भव हो सकेगा ।
बहुत बहुत धन्यवाद सर। इसी दिशा में प्रयास रहेंगे।
Deleteधन्यवाद सर। सही कहा आपने।
Deleteसुंदर विवेचन
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