Saturday, 20 March 2021

वॉल्ट डिज्नी :ऐनीमेशन का बादशाह




पुस्तक का नाम: वॉल्ट डिज्नी: ऐनीमेशन का बादशाह
लेखक: विजय शर्मा
समीक्षक : विपिन शर्मा 'अनहद'
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, दरिया गंज, नई दिल्ली
पृष्ठ संख्या: 284
मूल्य: 595/- (हार्ड बाउंड)



हिन्दी में रचनाधर्मिता का अर्थ उपन्यास, कहानी, कविता से लगाया जाता रहा है। इसका दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि हिन्दी पाठक और हिन्दी समाज के चिंतन दायरे तंग होते चले गए। विजय शर्मा का लेखन इसी यथास्थितिवादी मन:स्थिति और वैचारिकी को तोड़ता है। पाठक समुदाय के लिए सरहदों के पार की रचनात्मक खिड़की खोलता है। चिंतन की गहराई और विषय की व्यापक समझ उन्हें महत्वपूर्ण रचनाकार में परिवर्तित करती है। देश-दुनिया के साहित्य, इतिहास, सिनेमा पर विपुल लेखन इस बात का प्रमाण है। ताजगी और साफ़गोई उनकी विशेषता है।
विपिन शर्मा 

‘वॉल्ट डिज्नी: ऐनीमेशन का बादशाह’ विजय शर्मा की वाणी प्रकाशान से प्रकाशित पुस्तक है – यह न केवल वॉल्ट डिज्नी की जिंदगी का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात महाशक्ति के रूप में उभर रहे अमेरिका के बारे में भी तफ़्सील से बात करती है। लेखिका की व्यापक सोच, खुली दृष्टि की छाप पुस्तक के हर पृष्ठ पर दिखाई देती है। विश्व साहित्य एवं विश्व सिनेमा पर हम उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर पढ़ते रहे हैं। अपनी रचनात्मक जीवटता से उन्होंने दुनिया नापी है। जीवनी प्राय: उल्लखित व्यक्ति के जीवन का तथ्यात्मक ब्योरा बन कर रह जाती है। ‘वॉल्ट डिज्नी: ऐनीमेशन का बादशाह’ इस बात का अतिक्रमण करती है। अपनी पठनीयता से यह पाठक को बाँधती, जकड़ती है। एक प्रवाह और रवानगी है इस कृति में जो अद्योपांत पुस्तक को पढ़ने को विवश करती है। इसके साथ ही नए प्रकार की किताबों के उभर रहे नए पाठक वर्ग की जरूरतों को भी यह किताब पूर्ण करती है। 

किताब सात अध्यायों में विभक्त है – 1. बचपन, 2. संघर्ष, 3. वॉल्ट डिज्नी: प्रोपगंडा, 4. आदिम चिंतन और वॉल्ट डिज्नी, 5. वॉल्ट डिज्नी परिवार में, 6. वॉल्ट डिज्नी: एक विजनरी लीडर, 7. वॉल्ट डिज्नी: चुनिन्दा ऐनीमेशन फ़िल्में। परिशिष्ट के तहत वॉल्ट डिज्नी की चुनी हुई फ़िल्मों की सूचि दी गई है।

यह पुस्तक एक रचनाकार के बनने की प्रक्रिया को भी गहराई से विश्लेषित करती है। बचपन के संदर्भ ‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास एवं इजाडोरा डंकन की आत्मकथा में बड़ी सघनता से उभरे हैं। वल्ट डिज्नी के बचपन के बारे में पढ़ते हुए इजाडोरा का बचपन आँखों के आगे घूम जाता है, वॉल्ट के बचपन के बारे में लिखती हुई विजय शर्मा एक किस्सागो में रूपांतरित हो जाती हैं। वॉल्ट के बचपन में झेली यातनाएँ पाठक को विह्वल करती हैं। बाल मनोविज्ञान को लेखिका ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है। वॉल्ट डिज्नी का पिता इलियास डिज्नी अपने कैरियर में असफ़ल रहा। ऐसे लोग प्राय: जीवन से उदास हो जाते हैं और चिड़चिड़े भी। इलियास जरूरत से ज्यादा लालची और असुरक्षित था। इसी तरह से वॉल्ट डिज्नी अपने चाचा रॉबर्ट डिज्नी को अपना आदर्श मानने लगता है क्योंकि वह किसी भी तरह से सफ़लता प्राप्त करना जानता है। 

बचपन में वॉल्ट ने अखबार बाँट कर घार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में मदाद की। मिस्टर शेरवुड के यहाँ भी वॉल्ट ने काम किया। बचपन के संघर्ष का उसको बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है। शेरवुड उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है। शेरवुड की बात को वॉल्ट ने हमेशा अपने मन में रखा, ‘अपना अज्ञान मानने से कभी डरो मत।’ वॉल्ट ने अपनी गरीबी, संघर्ष से काफ़ी कुछ सीखा। वॉल्ट का फ़ौजी बनने का स्वप्न था। प्रत्यक्ष रूप से तो वह कभी फ़ौज में शामिल न हो पाया, हाँ, रेडक्रॉस के साथ जुड़ कर द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी फ़ौजियों की सहायता अवश्य की।

विजय शर्मा सिलसिलेवार वॉल्ट की जिंदगी के तमाम रेशों को खोलती हैं। यहाँ तक कि उसकी स्वबावगत कमजोरियों को भी। वॉल्ट के बड़बोलेपन को भी वे रेखांकित करती हैं। अपनी प्रेमिका का वह ‘अन्य’ से शादी करने के लिए हमेशा कोसता रहता है, मगर बिट्रिस ने पहले ही उसने सब स्पष्ट अकर दिया था। पिता की ज्यादतियों को वॉल्ट अतिरंजनापूर्ण प्रस्तुत करता है। बचपन के कसैले अनुभवों ने वॉल्ट को दृढ़ व्यक्ति के रूप में रूपांतरित किया, विजय शर्मा कहती है, 
वह प्रौढ़ता की दहलीज पर कदम रख चुका था। अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम था। उसे पक्का मालूम था कि वह जेली फ़ैक्टरी में काम नहीं करने वाला है। वह या तो एक्टर बनेगा अथवा चित्रकार। उसे यह भी मालूम था कि काम का मिलना आसान न होगा। वह आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हो चुका था।’ (पृष्ठ 63)

वॉल्ट को बचपन से ही समूह में रहना पसंद था। लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का कोई भी मौका वह नहीं छोड़ता था। पिता के विपरीत प्रसन्न रहना उसका स्वभाव था। इसी वजह से वह लोगों से घिरा रहता। वॉल्ट सातवीं कक्षा में था। पढ़ने में औसत मगर चित्रकारी में उत्कृष्ट। विदाई समारोह में बोलते हुए वॉल्ट के प्रिंसिपल ने कहा, ‘अगर आप चाहते है तो वह आपकी पेंटिंग बना सकता है।’ यह बता वॉल्ट को हमेशा स्मरण रही। एक कलाकार के रूप में स्वयं को स्थापित करने की वॉल्ट में हमेशा तीव्र इच्छा रही। पुस्तक का द्वितीय अध्याय, ‘संघर्ष’ है। इस अध्याय में विजय शर्मा वॉल्ट के जीवन के बहाने अमेरिका में पनप रहे पूँजीवाद एवं फोर्डवाद  की प्रवृति पर विस्तार से बात करती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात एकमात्र अक्षुण्ण शक्ति के रूप में अमेरिका ही बच गया था। स्वयं को औद्योगिक साम्राज्य का अगुआ बनाने के लिए वह कटिबद्ध था। वॉल्ट उत्साही अमेरिका के स्वप्न में निज स्वप्न मिला देता है।

इस अध्याय में वॉल्ट के कार्टूनिस्ट बनने के लिए की गई अथक मेहनत हमारे सामने प्रकट होती है। वह ‘स्टार’ समाचार पत्र के लिए कार्टून बनाता है। विजय शर्मा कहती हैं, 
‘वह पागल की तरह काम कर रहा था। उसमें सीखने की अदम्य भूख थी। वह कहीं से भी सीखने को तत्पर था। मन लायक काम हो तो वह शक्ति से ज्यादा मेहनत करता। एक बार पेसमेन ने उसे विज्ञापन का मुख पृष्ठ बनाने का आदेश दिया और शाम को वॉल्ट खीसें निपोरे अगला औएअ पिछला दोनों कवर बना कर खड़ा था।' (पृष्ठ 66) 

वॉल्ट ने अपने कार्टूनों में 1920 के आस-पास के जीवन को अपनी कार्टून कला का आधार बनाया। दुनिया (1920) कार्टून अत्यंत चर्चित हुआ। विश्वयुद्ध, शांति वार्ता, हड़ताल. चीनी की कमी. जैसे मुद्दे वॉल्ट की रेखांकन कला में उभरने लगे। एक बात और किताब पढ़ते हुए उभरती है, जीनियस लोग हमेशा जोखिम उठाने वाले औरे नवोन्मेषी होते हैं। वॉल्ट अब कार्टून में प्रयोग करना चाहता था। ऐनीमेशन की दुनिया उसे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। वहां मिलने वाला पैसा, माध्यम का तकनीकि आकर्षण आदि सब तत्व हमेशा उसके प्रिय रहे। शुरुआती दौर में ऐनीमेशन को ले कर कोई प्रशिक्षण संस्थान नहीं था। लेकिन वॉल्ट ने सिटी स्लाईड कंपनी में काम एवं अन्य माध्यमों से चीजें सीखने का प्रयास किया। वॉल्ट ने ‘न्यूमैन लाफ़ ओ ग्राम्स’ अपने कार्टूनों को नाम दिया। रोजमर्रा की जिंदगी से उठाए संदर्भ वॉल्ट को महत्वपूर्ण कलाकार के रूप में परिवर्तित करते हैं। वॉल्ट ने अपने कार्टूनों को फ़िल्म में रूपांतरित किया। वॉल्ट के बड़े भाई राय ने हमेशा वॉल्ट का साथ दिया। एक बार राय को टीबी हुई और उसे न्यू मैक्सिको के सान्ता सेनेटोरियम भेजा गया। राय को लगता यह उसके अंतिम दिन हैं मगर नियति को तो कुछ और मंजूर था। राय वॉल्ट का केवल भाई, बल्कि घनिष्ट मित्र और प्रेरक भी था।

वॉल्ट के जीवन का सूत्रवाक्य है, ‘कितना भी अच्छा हमें मिले, कितनी भी सफ़लता हमें मिल जाए, सर्वोत्तम आना अभी शेष है।’ (पृष्ठ 97) विजय शर्मा वॉल्ट के जीवन की तहों को खोलती हैं। रोचकता इस पुस्तक की खास विशेषता है। इस दौर में वॉल्ट के पास कापड़े और भोजन भी नहीं था, मगर इसी दौर मे उसने ‘ट्रामी टैक्कर ट्रूथ’ आदि फ़िल्में बनाईं।

पुस्तक का तीसरा अध्याय, ‘वॉल्ट डिज्नी: प्रोपगण्डा’ वॉल्ट के नाजीवाद विरोध एवं पूँजीवाद समर्थन में झुक जाने की व्याख्या करता है। वॉल्ट के कार्यालय में हड़ताल हुई, उसके विश्वासपात्र लोगों ने भी उसके खिलाफ़ झंडा बुलंद किया। वॉल्ट पर इसके असर को लेखिका ने बहुत बारीकी से उभारा है। वॉल्ट चिड़चिड़ा होता चला गया। इसी समय वॉल्ट ने सरकारी अनुदान पर फ़िल्म निर्माण किया। हिटलर का उपहास करने के लिए ‘डोनाल्ड इन नटजी लैंड’ बनाई। अमेरिका के हुक्मरानों को वायुसेना की महत्ता बातने के उद्देश्य से ‘विक्ट्री थ्रू एयर पावर’ बनाई। ‘बैम्बी’ अतियथार्थवादी ऐनीमेशन फ़िल्म थी। मच्छर नियंत्रण पर बनी ‘द विंग्ड स्कौज’ ने ‘गॉन विथ द विन्ड’ की लोकप्रियता को पीछे छोड़ दिया। वॉल्ट ने बड़े औद्योगिक घरानों के लिए विज्ञापन फ़िल्मों का निर्माण किया। कहने का अर्थ है यहाँ कला पर धन हावी हो गया।

वॉल्ट के जीवन पर तफ़्सील से बात करती हुई विजय शर्मा एक महत्वपूर्ण तथ्य पाठक से साझा करती हैं, 
‘अमेरिका में जो सबसे बड़ी चीज निर्यात की है वह है मनोरंजन, हँसी, प्रसन्नता। यह वह अपने जीवन के अंतिम क्षण तक करता रहा।’ वॉल्ट डिज्नी की साफ़गोई इस पुस्तक में प्रबलता से उभरती है। अंत समय तक भी लोग उसे कार्टूनिस्ट ही समझते रहे, इसी पदवी से नवाजते रहे। मगर खुद उसने एक बार कहा, ‘अब आजकल मैं केवल हस्ताक्षर, चेक काटने अथवा ऑटोग्राफ़ देने के लिए पेन या पेंसिल हाथ में उठाता हूँ।’ (पृष्ठ 135) 

यह जीवनी सिलसिलेवार चलती है, पढ़ने की ललक उत्पन्न करते हुए। ‘आदिम चिंतन और वॉल्ट डिज्नी’ चतुर्थ अध्याय है। इसमें वॉल्ट की सरहदों के पार फ़ैली लोकप्रियता, कला मर्मज्ञों द्वारा की गई प्रशंसा का वर्णन है। वॉल्ट यहाँ पर सिर्फ़ कार्टूनिस्ट ना हो कर मुक्ति की कामना के पैरोकार के रूप में उभरता है। ‘मिक्की माउस’ का सृजन कर अपने ही देश के हमनाम कवि वॉल्ट विटमैन की लोकप्रियता को अतिक्रमित कर जाता है। देश-दुनिया के सत्रह विश्वविद्यालयों द्वारा उसे मानद उपाधि प्रदान की जाती है, जिसे वह विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर देता है। वॉल्ट के जीवन के कई महत्वपूर्ण पक्ष उभरते हैं। पंचम अध्याय, ‘वॉल्ट डिज्नी परिवार में’ में लेखिका ने वॉल्ट के जीवन के तनावों, संघर्षों को पाठक से साझा किया है। विजय शर्मा बताती हैं कि वॉल्ट एकनिष्ठ पति, स्नेहिल, जिम्मेदार पिता एवं सहृदय भाई था। पिता और पुत्र के बीच द्वंद्व अवश्य रहा, मगर माता के प्रति उसका कोमल भाव था। राय डिज्नी और वॉल्ट के बीच हमेशा आत्मीय संबंध रहे।

‘वॉल्ट डिज्नी: एक विजनरी लीडर’ में विजय शर्मा वॉल्ट की मौलिकता का विश्लेषण करती हैं। वह एक बेहतरीन स्वप्न दृष्टा था उसने ‘डिज्नीलैंड’ के स्वप्न को साकार किया। वॉल्ट डिज्नी की बनाई फ़िल्म में ‘लिटिल पिग्स’ के गीत ‘हू इज अफ़्रेड ऑफ़ द बिग बैड वुल्फ़’ के माध्यम से अमेरिका को महामंदी से लड़ने का हौसला दिया।

अंतिम अध्याय ‘वॉल्ट डिज्नी: चुनिन्दा ऐनीमेशन फ़िल्में’ में वॉल्ट की महत्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में बात की गई है। ‘मिक्की माउस’, ‘बैम्बी’, ‘स्नो व्हाइट’ आदि। कुल मिला कर यह पुस्तक वॉल्ट डिज्नी की जीवनी तो है ही इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध एवं उसके आस-पास की ऐतिहासिक घटनाओं, फ़ासीवाद के उभार, अक्षुण्ण शक्ति के रूप में उभर रहे अमेरिका के आर्थिक एवं सांस्कृतिक ताने-बाने का गहरा कोलाज भी इस पुस्तक में उभरता है। अंत में कहना चाहूँगा यह हिन्दी का भी विस्तार है। कथात्मक साहित्य से इतर नए प्रकार के लेखन के लिए उभर रहे बाजार का भी सूचक है।


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