Thursday, 6 June 2019

जनता को हांकते हुक्मरान



पढ़े लिखे होने के नाते हम लोग यह आसानी से समझा जा सकता है कि 'हिंदी थोपने के नए अध्याय' के तहत जो कुछ हो रहा है चाहे केंद्र की तरफ से हो या राज्य की राजनीतिक पार्टियों की ओर से सब कुछ राजनीति है, कोरी राजनीति और इसके अलावा कुछ नहीं। केंद्र सरकार ने बिना कुछ सोचे-समझे त्रिभाषा के घिसे-पिटे सूत्र को बंद किताबों में से निकाल डाला। तमिलनाडु के सत्ताधीशों की ओर से हिंदी विरोध के लिए आक्रमकता अपेक्षित थी। लेकिन ए.आर. रहमान जैसे संगीतज्ञ का इस विवाद में कूदना यह बताने के लिए पर्याप्त है की भाषाई कट्टरता किस ओर तीव्रतर है। जबकि गनीमत रही कि हिंदी पट्टी के किसी नेता या अभिनेता ने अनावश्यक आक्रामकता नहीं दिखायी।


पूरे विमर्श में जिस बात को अनदेखा किया जा रहा है वह है; भाषा, मनुष्य को समाज और संस्कृति से जोड़ने के अलावा एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाती है। भाषा जीविकोपार्जन का माध्यम भी बन सकती है।भारत में अंग्रेजी सीखने का चलन इसीलिए बढ़ रहा है, ये सोच कितनी सही है ये दीगर बात है।

तमिलनाडु प्रवास के दौरान एक मजेदार बात पता चली। केरल की तर्ज पर वहाँ धड़ले से नर्सिंग स्कूल खोले गए पर मलयाली नर्सें इस क्षेत्र में सफल नौकरी पा सकीं लेकिन तमिल नर्सें सफल न हो सकी क्योंकि मलयाली नर्सें हिंदी से परिचित थी और उत्तर भारत में सामंजस्य बिठाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई जबकि तमिल नर्सें तमिलनाडु से बाहर निकलकर असहज महसूस करती थीं।

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि मैं कारैकुड़ी, दिंदुगल, तिरुनलवेली, तुत्तूकुड़ी जैसे ठेठ तमिल क्षेत्रों का दौरा कर चुका हूं और वहां पर मैंने 30 दिनों में हिंदी सीखें जैसे पोस्टर लगे हुए देखे। अब सोचने वाली बात यह है की विरोध के बाद भी यह कौन लोग हैं जो हिंदी सीखना चाहते हैं। स्पष्ट है कि यह विरोध ठीक उसी तरह का विरोध है जैसा 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी के लिए हुआ था। न कोई उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी को रोक सका न कोई तमिलनाडु में हिंदी को रोक सकेगा (क्योंकि बात रोजगार की है साहब)।

जैसे ही तमिल व्यक्ति तमिलनाडु से बाहर कदम रखता है वह नीति निर्धारकों को कोसना शुरू कर देता है जिसने उसे आज तक कभी हिंदी नहीं सीखने दी या हिंदी सीखने के पर्याप्त अवसर नहीं दिए। चेन्नई में पब्लिक स्कूल के अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन करके यह कहा कि उनके बच्चों को हिंदी सीखने के समान अवसर दिए जाएं। यह बात बड़ी खबर नहीं बन सकी और चेन्नई में बैठे हुए जिन कानों तक यह बात पहुंचनी चाहिए थी वहां पहुंच कर भी है अनसुनी ही रह गई।

एक बार एक तमिल व्यक्ति ने जो अपनी नौकरी से रिटायर होने वाला था मुझसे कहा कि वह हिंदी सीखना चाहता है। बात कुछ अटपटी लगी। बाद में उसने कारण बताया कि जब वह अपने बेटे के पास अमेरिका जाता है तो अपने आयु वर्ग के लोगों में शामिल होने का प्रयास करता है। वहां उपस्थित भारतीय समुदाय में सभी लोग चाहे वह गुजराती हों  मलयाली  हों, पंजाबी हों बिहारी हों केवल हिंदी में ही बात करते हैं और वो खुद को बहुत कटा कटा महसूस करता है।

Image Courtesy Pixabay 
इस प्रकरण से एक बात साफ है कि दिल्ली में बैठे हुक्मरान शिक्षा नीति को लेकर गम्भीर नहीं है। शिक्षा नीति में त्रिभाषा को डालना फिर आनन फानन में डैमेज कंट्रोल करते हुए उसे हटा लेना उनकी गम्भीरता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। लेकिन बेहद अफसोस के साथ ये भी कहना पड़ेगा कि तमिलनाडु सरकार ने तमिल लोगों को हिंदी सीखने के लिए बाजार के जिम्मे छोड़कर उनके साथ न्याय नहीं किया।



Sunday, 26 May 2019

बेरोजगारी को मात देती हिंदी

भूमंडलीकरण संचार साधनों की उंगली पकड़कर खड़ा हुआ, पूंजीवाद की घुट्टी पीकर बड़ा हुआ तो बाजार ने इसे अपने इशारे पर चलना सिखाया| बाजार केवल खरीदना और बेचना जानता है| बेचने के लिए उपभोक्ता को लुभाना आवश्यक है इसलिए मार्केटिंग जरूरी है| मार्केटिंग या प्रचार के लिए पहली शर्त है यू.एस.पी.(Unique Selling Point)। अगर न हो तो क्रियेट कीजिये| हाट में माल बेचना है तो खूबी तो बतानी ही पड़ेगी| क्रय-विक्रय के इस खेल में मतलब है तो सिर्फ अपने माल से और मुनाफे से| जो बेचा जा सकता है उसे खरीदना है और जो खरीदा जा सकता है उसे बेचना है| भूमंडलीकरण के इस दौर में एक देश के बाजार दूसरे देश के बाजार से जुड़ रहे हैं| अब तीसरी दुनिया की जनसंख्या भीड़ नहीं कंज्यूमर है| इसी को लक्ष्य करके मार्केटिंग या विपणन की तमाम रणनीति तैयार की जानी है| Target consumer की कोमल भावनाओं को भेदो। उसकी भाषा बोलो तभी माल बिकेगा| बस इसी तरह न चाहते हुए भी खरीद-बेच के ठीक बीच में आकर भाषा अपना वर्चस्व दिखा देती है|

यहाँ दो प्रक्रिया साथ-साथ घटित होती हैं - मुनाफे की भाषा और भाषा से मुनाफा | मुनाफे की भाषा माल बेचने वाला या माल का प्रचार करने वाला सीखता है जबकि उपभोक्ता के लिए यही अवसर होता है भाषा के माध्यम से धन बनाने का| जितना बड़ा उपभोक्ता वर्ग होगा उतना ही बाजार उत्सुक होगा उसकी भाषा सीखने के लिए। बाजार अपनी भाषा सीखा भी सकता है लेकिन यह एक धीमी प्रक्रिया है और बहुत से अन्य घटकों पर भी टिकी है| बाजार भाषा सीखने के लिए जितना उत्सुक होगा भाषा के प्रयोक्ताओं के लिए उतने ही अवसर उत्पन्न होंगे| विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा की लगभग सभी सूचियों में हिन्दी का स्थान कमोबेश प्रथम पांच में है| जबकि व्यापारिक दृष्टि से विश्व की 10 शीर्ष भाषाओं में हिन्दी को शामिल किये बिना सम्भवत: कोई सूची मुकम्मल नहीं होती| Top 100 Online Languages की बात करें तो हिन्दी के ऑनलाइन प्रयोग में 66% का उछाल देखा गया है| Global Content and Language Solution  द्वारा जारी एक सूची में व्यापार की दृष्टि से विश्व की  शीर्ष भाषाओं में हिन्दी को 10वें स्थान पर रखा गया है| इस लेख में बिजनेस मैनेजमेंट पर शोध करने वाली संस्था CSA के हवाले से लिखा गया है कि 88% भारतीय अंग्रेजी नहीं जानते|   अब इसी आंकड़े के साथ एक और आंकड़े को जोड़ देते हैं| Indian Readership Survey -2017 के अनुसार भारत में पढ़े जाने वाले शीर्ष 10 अखबारों में अंग्रेजी का एक भी नहीं है| इन सब आंकड़ों से एक बात तो स्पष्ट होती है कि हिन्दी मरती हुई नहीं बहुत तेजी से बढ़ती हुई भाषा है| ऐसा नहीं है कि इन भाषा के इस बढ़ते बाजार में केवल और केवल हिन्दी ज्ञान ही नौकरी के लिए पर्याप्त होगा लेकिन हिन्दी के विद्वानों को बाजार में भाव न मिले ऐसा सम्भव नहीं है|
रोजगार के जिन क्षेत्रों का विश्लेष्ण किया गया है वो रोजगार के परम्परागत क्षेत्रों (शिक्षण और अनुवाद) से पूरी तरह अलग हैं| इसी के साथ-साथ रचनात्मक लोगों के लिए टी.वी. और फिल्मों से इत्तर यू-ट्यूब और नेट सीरीज ने रचनात्मक लेखन को नये आयाम दिए हैं| मध्यवर्ग की बढ़ती क्रय शक्ति ने डोमेस्टिक कॉल सेंटर क्षेत्र का नया क्षेत्र अस्तित्व में आया है|डोमेस्टिक कॉल सेंटर भी हिंदी जानने वाले टेक फ्रेंडली किशोरों को नौकरी पर रखना  पसन्द करते हैं।

भाषा के विकास का सीधा-सम्बन्ध भाषा के लोगों के आर्थिक विकास से है| जैसे-जैसे हिन्दी पट्टी में मध्यवर्ग का दायरा और बढ़ेगा हिन्दी में रोजगार की सम्भावनाओं को भी पंख लगते जायेंगे| इससे केवल हिन्दीभाषी ही लाभान्वित नहीं होंगें बल्कि हिन्दी को जल्दी सीख लेने वाले गैर-हिन्दी भाषियों के लिए भी यह एक अतिरिक्त योग्यता बन चुकी है| वस्तुतः हिन्दीत्तर भाषियों के लिए हिन्दी सीखने का जैसा दबाव आज के दौर में बाजार से आया है वैसा पहले नहीं था| बिहार या बंगाल का मजदूर यदि चेन्नई में काम करता है तो राशन उस दुकान से लेना पसंद करेगा जो दुकानदार थोड़ी-बहुत हिन्दी बोलता या समझता हो| मैंने अपनी हिंदी का विस्तार पोस्ट में ये स्पष्ट किया है कि श्रम का बहाव उत्तर से दक्षिण की ओर अधिक है जिसके परिणाम 2011 की जनगणना में दक्षिण भारतीय राज्यों में भाषा परिवर्तन के रूप में दिखते हैं|

बेरोजगारी के इस दौर में भाषा के प्रति कट्टर होने की नहीं ग्राह्य होकर भाषा को जीविकोपार्जन का साधन बनाने की आवश्यकता है|  


Thursday, 28 February 2019

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय का परिचय



हिन्दी की सरकारी व्यवस्था को समझने के लिए क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के बारे में जानना बहुत जरूरी है| राजभाषा विभाग के अंतर्गत चार कार्यालय आते हैं| केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, क्षेत्रीय कार्यान्वयन  कार्यालय, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान और संसदीय समिति सचिवालय| इस लेख में क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के बारे में संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास किया गया है| क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय (क्षे.का.का.) राजभाषा विभाग के अधीन कार्य करतें हैं| राजभाषा विभाग कुल 8 क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालयों द्वारा सभी नराकास के संपर्क में रहता है|

क्र सं.
कार्यालय
क्षेत्र
1.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पश्चिम)
महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, दमन दीव, दादरा एवं नागर हवेली
2.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (मध्य)
मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़
3.       
उत्तरी क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय-। (दिल्ली)
दिल्ली एवं संघ राज्य क्षेत्र, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर
4.       
उत्तरी क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय-।।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड
5.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पूर्व)
    पश्चिम बंगाल, उड़ीसा
    बिहार, झारखण्ड
अण्डमान एवं निकोबार
6.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (दक्षिण)
   आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक
7.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (पूर्वोत्तर)
    असम, मिजोरम, नागालैण्डमणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा
    सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश
8.       
क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय (दक्षिण-पश्चिम)
   केरल, तमिलनाडु
   पुदुच्चेरी, लक्षद्वीप

क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय के मुख्य कार्य

1.       नराकास का मार्गदर्शन

केन्द्रीय सरकार का प्रत्येक कार्यालय नगर स्तर पर नगर राजभाषा कार्यन्वयन (नराकास) समिति का भी सदस्य होता है| यह समिति नगर के कार्यालयों को राजभाषा नीति के क्रियान्वयन के लिए प्रोत्साहित करती है| नराकास के लिए अलग से कोई कार्यालय या स्टाफ नहीं होता| नराकास का कार्य किसी बड़े कार्यालय को अतिरिक्त दायित्व के रूप में सौंपा जाता है| अर्थात कि उत्तरदायी कार्यालय विभाग के नियमित कार्यालयों के अतिरिक्त नराकास के दायित्वों को भी वहन करेगा| नगर का वरिष्ठम अधिकारी इसका अध्यक्ष होता है और कार्यदायी संस्थान में तैनात हिन्दी कैडर का कार्मिक इसका पड़ें सदस्य सचिव होता है|  नराकास वर्ष में दो बैठक का आयोजन करता है| महानगरों में एक से अधिक नराकास भी हो सकते हैं, जैसे एक नराकास बैंकों और वित्तीय संस्थायों के लिए और एक अन्य सरकारी कार्यालयों के लिए| समान्यत: एक नराकास के अंतर्गत 50 से अधिक कार्यालय नहीं होते| नराकास के कार्यकलापों पर क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय नज़र रखते हैं| क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालयों के अधिकारी छमाही में आयोजित होने वाली नराकास बैठकों में भी शामिल होते हैं| इन बैठकों में केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों के कार्यालय प्रमुखों की उपस्थिति अनिवार्य है, कार्यालय प्रमुख के साथ-साथ हिन्दी संवर्ग के कार्मिक भी इन बैठकों में प्राय: उपस्थित रहते हैं| अत: यह कहा जा सकता है कि नराकास के माध्यम से क्षेत्रीय कार्यन्वयन कार्यालय केन्द्रीय सरकार के अधीन सभी कार्यालयों, विभागों, उपक्रमों, स्वायत्त संस्थानों, बैंकों, अन्य वित्तीय संस्थानों में हो रहे राजभाषा क्रियान्वयन के कामों पर नजर रखते है|   

2.       सरकारी कार्यालयों का निरीक्षण

क्षे.का.का. केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों का (चाहे वह शाखा कार्यालय हो, आंचलिक या क्षेत्रीय कार्यालय हो, मुख्य कार्यालय हो, मुख्यालय हो) राजभाषा सम्बन्धी निरीक्षण करता है| निरीक्षण के दौरान मिलने वाली कमियों को कार्यालय प्रमुख के संज्ञान में लाता है| निरीक्षण की रिपोर्ट आलोच्य कार्यालय के मुख्यालय कार्यालय को भी भेजी जाती है| इसके अतिरिक्त क्षे.का.का. राज्य स्तर पर राजभाषा सम्बन्धी पुरस्कारों के वितरण के लिए भव्य आयोजन भी कराता है| इस तरह क्षे.का.का. का कार्य बहुत विशाल और चुनौतीपूर्ण है| विडम्बना यह है कि इसकी भूमिका को बहुत नगण्य समझा गया और इन कार्यालयों को उतना महत्व नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था या कभी इनकी क्षमताओं को समझा ही नहीं गया| जब इनकी परिकल्पना की गयी तभी इनकी संख्या निश्चित कर दी गयी| तब से अब तक केवल 8 क्षे.का.का. ही हैं| कार्यक्षेत्र की बात करें तो एक-एक क्षे.का.का. के अंतर्गत अनेक प्रदेश हैं| जिस प्रकार पिछले कुछ समय में नराकास (नगर राजभाषा कार्यन्वयन समिति) नराकास को सीमित करने के प्रयास हुए हैं क्या इस प्रकार क्षे.का.का. के अंतर्गत आने वाली नराकास को सीमित करने के प्रयास भी नहीं होने चाहियें| उत्तर प्रदेश, जैसे बड़े राज्य और उत्तराखंड के लिए एक ही क्षे.का.का. का होना न केवल उसकी कार्य-क्षमता को सीमित करता है बल्कि समय-समय पर होने वाले निरीक्षणों के अभाव में राजभाषा क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया को भी ढुलमुल बना देता है| भोगौलिक दृष्टि से अति विस्तारित होने के कारण भी मुट्ठी भर अधिकारियों के लिए सभी नराकास के अंतर्गत आने वाले कार्यालयों का निरीक्षण करना बहुत कठिन हो जाता है| यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि निरीक्षण के अलावा क्षे.का.का. केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों से कोई सीधे संपर्क या संवाद नहीं करता जबकि व्यापक दृष्टि से क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले सभी केन्द्रीय कार्यालयों को राजभाषा कार्यन्वयन के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने का दायित्व क्षे.का.का. का है| क्षे.का.का. अपनी सीमित स्टाफ संख्या के चलते बहुत सीमित कार्यालयों के निरीक्षण ही कर पाते हैं| निरीक्षण के दौरान पायी गयी कमियों को ठीक कराने के लिए होने वाली अनुवर्ती कार्रवाई की औपचारिकता भी बमुश्किल ही हो पाती हैं|

Sunday, 13 January 2019

रिलैक्स ! हिन्दी अनिवार्य नहीं है |


प्रकाश जावड़ेकर जी ने कह ही दिया कि आठवीं कक्षा तक कोई एक भाषा अनिवार्य करने की कोई योजना नहीं है| इसी के साथ हिन्दी को अनिवार्य करने की सारी अटकलों पर विराम लग गया|  

चुनावी मौसम की खुमारी और अखिल भारतीय होती पार्टी से ये ही उम्मीद की जा सकती है| लेकिन हमारे कुछ राष्ट्रवादी मित्र, जो विदेशों में हिन्दी में दिए गये प्रधानमंत्री के भाषण से मंत्रमुग्ध थे, उनको अवश्य धक्का लगा होगा| वो सोचे बैठे थे कि हिन्दी की जो प्रगति होनी है वह इसी सरकार के कार्यकाल में होनी है| 

समस्या ये ही है, हम सरकारों से बहुत अधिक अपेक्षा करने लगते हैं लेकिन लोकतंत्र में सरकार के किसी भी निर्णय के तीन आधार होते हैं – वोटबैंक, वोटबैंक और वोटबैंक| सत्ता शास्त्रीय सिद्धांतों से नहीं चलती वो तो समाजिक समस्याओं की आड़ में अपने स्वार्थ के वशीभूत कोई निर्णय लेती है और उसे जनतांत्रिक मूल्यबोध का चोला पहना देती हैं| लोकतंत्र की समस्याएं भी इतनी तरल और सरल होती हैं कि समय के साथ खुद ही ढीली पड़ जाती हैं| मीडिया की तमाम कोशिशों के बावजूद आज राम जन्म भूमि उन्माद का विषय नहीं है| जनसंख्या की समस्या को लेकर पूरा विमर्श ही बदल गया है| अब इसे सरलीकृत रूप से मानव संसाधन की चुनौती समझा जा रहा है| इसी प्रकार ‘भाषा’ भी अब विद्वेष का साधन नहीं रह गयी है, बस सरकार उसे थोपने से बचे| ‘राजभाषा’ को लेकर जो राजनीति 60 और 70 के दशक में हुई वह आज की पीढी के लिए हास्यास्पद ही होगी|
ऐसे सभी निर्णय दीर्घकालिक रूप से हिन्दी के पक्ष में ही गये हैं| जब सुदूर दक्षिण और उत्तर पूर्व के सूबों में हिन्दी लगातार बढ़ रही है तो स्पष्ट है कि तमाम राजकीय अवरोध भी हिन्दी के विस्तार को रोकने में बोने सिद्ध हुए हैं| भाषा को लेकर राजकीय कट्टरता की कलई खुलने का एक मजेदार किस्से बताता हूँ| उत्तर भारत में केरल की नर्सों की बढ़ती मांग को देखकर केरल सरकार का अनुकरण करते हुए तमिलनाडु सरकार ने भी निर्णय लिया कि अपने यहां नर्सिंग इंडस्ट्री को पल्लवित-पोषित किया जाए| ताबड़तोड़ नर्सिंग कॉलेज खोले गये| लेकिन कुछ समय बाद यह पाया गया कि तमिल नर्सों को वो सफलता नहीं मिल रही है और तमिलनाडु में नर्सों को उतना वेतन नहीं मिल रहा जिसकी वो हकदार है| सरकार के निर्णय पर उंगलियाँ उठना स्वभाविक था| गहन जांच-पड़ताल कराई गयी जिसके बाद पाया गया कि केरल की नर्से इसलिए सफल हो पायीं क्योंकि वे हिन्दी समझ या बोल पा रही थी| मलयाली के साथ-साथ हिन्दी बोलने या सुनने के कारण उन्हें उत्तर भारत में सामंजस्य बैठने में अधिक कठिनाई नहीं हुई जबकि तमिलनाडु में राजनैतिक विरोध के चलते हिन्दी से वंचित युवावर्ग न तो हिन्दी भाषा सीख सका न तमिलनाडु के बाहर सफल हो सका|  
       केंद्र सरकार ने हिन्दी को अनिवार्य न करके अनावश्यक टकराव से बचने की कोशिश की है| हमसे तो आधिकारिक रूप से यह भी नहीं कहा गया कि अंग्रेजी अनिवार्य है| जिस प्रकार अंग्रेजी को सीखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वातावरण प्रेरित करता है उसी प्रकार राष्ट्रीय परिवेश हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करता है| समय की मांग यही है कि गैर-हिन्दीभाषी राज्य अपने राज्य के लोगों के लिए हिन्दी सीखने के सहज अवसर उपलब्ध करवाएं| अब राज्यों की बारी है कि वो अपना दायित्व निभाएं अन्यथा हमारे गैर-हिन्दी भाषी मित्र स्वयं को मुख्यधारा से विलग मानते रहेंगे| 
       केंद्र सरकार लाख कहे कि हिन्दी अनिवार्य नहीं है पर लोग सीखेंगे कयोंकि लोग बाजार की हवा देखते हैं सरकारी फतवे नहीं|