पढ़े लिखे होने के
नाते हम लोग यह आसानी से समझा जा सकता है कि 'हिंदी थोपने के नए अध्याय' के तहत जो
कुछ हो रहा है चाहे केंद्र की तरफ से हो या राज्य की राजनीतिक पार्टियों की ओर से
सब कुछ राजनीति है, कोरी राजनीति और इसके अलावा कुछ नहीं। केंद्र सरकार ने बिना
कुछ सोचे-समझे त्रिभाषा के घिसे-पिटे सूत्र को बंद किताबों में से निकाल डाला।
तमिलनाडु के सत्ताधीशों की ओर से हिंदी विरोध के लिए आक्रमकता अपेक्षित थी। लेकिन
ए.आर. रहमान जैसे संगीतज्ञ का इस विवाद में कूदना यह बताने के लिए पर्याप्त है की
भाषाई कट्टरता किस ओर तीव्रतर है। जबकि गनीमत रही कि हिंदी पट्टी के किसी
नेता या अभिनेता ने अनावश्यक आक्रामकता नहीं दिखायी।
पूरे विमर्श में
जिस बात को अनदेखा किया जा रहा है वह है; भाषा, मनुष्य को समाज और संस्कृति से
जोड़ने के अलावा एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाती है। भाषा जीविकोपार्जन का
माध्यम भी बन सकती है।भारत में अंग्रेजी सीखने का चलन इसीलिए बढ़ रहा है, ये सोच
कितनी सही है ये दीगर बात है।
तमिलनाडु प्रवास के
दौरान एक मजेदार बात पता चली। केरल की तर्ज पर वहाँ धड़ले से नर्सिंग स्कूल खोले गए
पर मलयाली नर्सें इस क्षेत्र में सफल नौकरी पा सकीं लेकिन तमिल नर्सें सफल न
हो सकी क्योंकि मलयाली नर्सें हिंदी से परिचित थी और उत्तर भारत में सामंजस्य
बिठाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई जबकि तमिल नर्सें तमिलनाडु से बाहर निकलकर
असहज महसूस करती थीं।
प्रसंगवश उल्लेखनीय
है कि मैं कारैकुड़ी, दिंदुगल, तिरुनलवेली, तुत्तूकुड़ी जैसे ठेठ तमिल क्षेत्रों का
दौरा कर चुका हूं और वहां पर मैंने 30 दिनों में हिंदी सीखें जैसे पोस्टर लगे हुए
देखे। अब सोचने वाली बात यह है की विरोध के बाद भी यह कौन लोग हैं जो हिंदी सीखना
चाहते हैं। स्पष्ट है कि यह विरोध ठीक उसी तरह का विरोध है जैसा 90 के दशक में
उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी के लिए हुआ था। न कोई उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी को रोक
सका न कोई तमिलनाडु में हिंदी को रोक सकेगा (क्योंकि बात रोजगार की है साहब)।
जैसे ही तमिल
व्यक्ति तमिलनाडु से बाहर कदम रखता है वह नीति निर्धारकों को कोसना शुरू कर देता
है जिसने उसे आज तक कभी हिंदी नहीं सीखने दी या हिंदी सीखने के पर्याप्त अवसर नहीं
दिए। चेन्नई में पब्लिक स्कूल के अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन करके यह कहा कि उनके
बच्चों को हिंदी सीखने के समान अवसर दिए जाएं। यह बात बड़ी खबर नहीं बन सकी और
चेन्नई में बैठे हुए जिन कानों तक यह बात पहुंचनी चाहिए थी वहां पहुंच कर भी है
अनसुनी ही रह गई।
एक बार एक तमिल
व्यक्ति ने जो अपनी नौकरी से रिटायर होने वाला था मुझसे कहा कि वह हिंदी सीखना
चाहता है। बात कुछ अटपटी लगी। बाद में उसने कारण बताया कि जब वह अपने बेटे के पास
अमेरिका जाता है तो अपने आयु वर्ग के लोगों में शामिल होने का प्रयास करता है।
वहां उपस्थित भारतीय समुदाय में सभी लोग चाहे वह गुजराती हों मलयाली
हों, पंजाबी हों बिहारी हों केवल हिंदी में ही बात करते हैं और वो खुद को बहुत कटा
कटा महसूस करता है।
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| Image Courtesy Pixabay |
इस प्रकरण से एक
बात साफ है कि दिल्ली में बैठे हुक्मरान शिक्षा नीति को लेकर गम्भीर नहीं है।
शिक्षा नीति में त्रिभाषा को डालना फिर आनन फानन में डैमेज कंट्रोल
करते हुए उसे हटा लेना उनकी गम्भीरता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। लेकिन बेहद अफसोस
के साथ ये भी कहना पड़ेगा कि तमिलनाडु सरकार ने तमिल लोगों को हिंदी सीखने के लिए
बाजार के जिम्मे छोड़कर उनके साथ न्याय नहीं किया।

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