भाषा का प्राण तत्व
है उसके प्रयोक्ता से उसका जुड़ाव| इस जुड़ाव को भाषाई कट्टरता समझने की चूक हो सकती
है परन्तु इस जुड़ाव के बिना भाषाई अस्मिता की अवहेलना से भाषा के सिमटने का ख़तरा
बना रहता है जो भाषा के लिए घातक हो सकता है| निजभाषा से जुड़ाव के जो उदाहरण हमें तमिल
भाषियों में, फ्रांसियों में, या बंगलाभाषियों में मिलते हैं वो प्राय:
हिन्दीभाषियों में नहीं मिलते| इसे आप मेरी ‘नकारात्मकता’ समझने की जल्दी न
करें| मैं भी इस प्रकार की बात करने वालों को ‘नकारात्मक’ ही मानता रहा था परन्तु
तठस्थ होकर विचार करें तो लगेगा कि बात में वजन तो है|
हिन्दी भाषियों ने
अपनी भाषा के लिए कभी कोई आन्दोलन या संघर्ष किया हो, इतिहास में इसके साक्ष्य
नहीं मिलते, क्षेत्रीय स्तर पर कुछेक छुट-पुट घटनाएँ जरूर हैं| स्वतंत्रतापूर्व या
स्वतन्त्रोत्तर भारत में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने का विमर्श
आमजन का आन्दोलन था इसमें संदेह है| प्रभाकर क्षोत्रीय लिखते हैं
‘हिन्दी को
राष्ट्रभाषा बनाने का स्वप्न हिंदीभाषियों का नहीं था| राष्ट्रभाषा के रूप में
इसकी आवश्यकता सबसे पहले अहिन्दीभाषियों ने ही अनुभव की| हिंदीभाषियों ने तो उनके स्वर
में स्वर मिलाया, ताकि अन्हें नकारा न मान लिया जाए| ’1
इतना अवश्य है कि हिन्दी के विरोध में जो आन्दोलन हुए वह हिंसक हो गये थे
जिनकी प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तर भारत में कुछ प्रदर्शन आदि अवश हुए| उस दौर में
हिन्दी भाषा को हिन्दू धर्म से जोड़कर खूब राजनीति हुई जिस कारण हिन्दी का जनाधार
खंडित हुआ| गांधी जी को कहना पड़ा कि हिन्दी नहीं बोलना चाहते तो हिन्दुस्तानी बोल
लो| ये हिन्दुस्तानी कुछ और नहीं हिन्दी का ही वह रूप था जिसमे उर्दू-फारसी के
शब्दों का खुलकर प्रयोग किया जाता था| लिपि को लेकर उनके मन में कभी कोई संशय नहीं
था| वे देवनागरी में लिपि एक ऐसी भाषा के पक्षधर थे जो सभी देशवासियों के लिए सहज
हो| वह तो अखिल भारतीय भाषाओं के लिए सिर्फ एक ही लिपि रखन चाहते थे|
‘आर्य भाषाओं में इतनी समानता है कि अगर भिन्न-भिन्न लिपियाँ सीखने में
बहुत-सा समय बर्बाद न करना पड़े तो हम सब किसी बड़ी कठिनाई के बिना कई भाषाएँ जान
लें|’2
इसके लिए हिन्दी के कलेवर में अमूल-चूल परिवर्तन उन्हें स्वीकार्य था| गांधी
जानते थे कि उर्दू सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ से शब्द लेकर हिन्दी समृद्ध ही
होगी|
सयानों की बात न मानने से पछतावा होता
है। हुआ। स्वतंत्रता के बाद हिन्दी तर्पण के सभी अनेक प्रयास किये गये| सरकार के
बड़े बाबुओं ने 'अंग्रेजी' को 'क्लास’ बनाया। अभय दूबे ने इसे बहुत प्रमाणिक और तार्किक रूप से सिद्ध
किया है| उन्हीं के शब्दों में
‘अंग्रेजी को अपनी ‘सांस्कृतिक पूंजी’ की तरह ग्रहण
करने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा ने हिन्दी को कभी नहीं अपनाया|’3
सरकारी बाबुओं की
इस ‘अंग्रेजी क्लास’ से जुड़ने की इच्छा महानगरों से होती हुई छोटे शहरों तक पहुंची
फिर छोटे शहरों से होते हुए कस्बों और गाँवों तक| आज छोटे-छोटे कस्बों तक में
अंग्रेजी स्कूल से लेकर मैगजीनों का ऐसा बजार खड़ा हो चूका है जिसने हिन्दी को
हाशिये पर ला दिया है| बजारों में दुकानों प्र लगे बोर्डों से हिन्दी गायब हो गयी
है| विज्ञापनों से हिन्दी विलुप्त-प्राय: सी है| हिन्दी अखबारों ने योजनाबद्ध
तरीके से खबरों में अंग्रेजी शब्द भरे| पिछले दो दशकों में जिस ‘मध्यम वर्ग’ के
चारों ओर बजार नाच रहा है उसी मध्यम वर्ग ने अंग्रेजी को ‘ट्रेंडी’ या ‘इंटरनेशनल’
माना और हिन्दी को ‘देहाती’| पढ़े-लिखे ज्ञानवान होने के लिए अंग्रेजी आना पहली
शर्त समझी गयी|
लेकिन साहब
मातृभाषा कोई बदन से लिपटा पुराना कपड़ा तो है नहीं वो तो अवचेतन में बसे किसी
संस्कार की तरह है जो लाख चाहने पर भी पीछा नहीं छोड़ता| जैसे कोई शाकाहारी व्यक्ति
लाख चाहकर भी मात्र अंडे से आगे नहीं बढ़ पाता| ऐसे ही अंग्रेजी के दो चार वाक्य
सीखने पर कोई अपनी मातृभाषा नहीं छोड़ सकता| शिकायत बस इस बात की है कि हिन्दी
बोलने में हमे वो गर्व नहीं होता जो बंगाल के व्यक्ति को बंगला बोलने पर होता है
या तमिलनाडु के व्यक्ति को तमिल बोलने पर| हिन्दी वालों के साथ अक्सर देखा गया है
कि अभिजात्य वर्ग के संपर्क में आते ही उनके मुख से अंग्रेजी शब्द निकलने लग जाते
हैं| हम केरला में हो या असम में अपनी बात समझाने के लिए अंग्रेजी का ही प्रयोग
करते हैं| शादी का कार्ड हो या मुंडन का हमे, ‘इंग्लिश’ में ही अच्छा लगता है|
दसवी पास को भी अगर आप नाम लिखने को कहेंगे तो रोमन में लिखेगा| हम मायानगरी के
सितारों को हिन्दी रोमन में पढने के लिए कोसते हैं लेकिन कभी-कभी लगता है कि वो
दिन दूर नहीं जब दिल्ली में बैठा हिन्दी समाचार पढने वाला न्यूज़ एंकर भी कहेगा
‘यार रोमन में लिखकर दिया करो – फ्लो आएगा !’
पिछले दो दशकों में
मध्यम वर्ग से उपजे इंजीनियर और प्रोफेशनलों की नयी बिरादरी ने नोएडा, गुडगांव,
गुरुग्राम, बैंगलूरू, हैदराबाद आदि शहरों में घर बसाया| इन पढ़ें लिखे मजदूरों के
आलीशान फ्लैटों में देखें तो पायेंगे कि दक्षिण भारतीय जहां घर में अपनी मातृभाषा
का प्रयोग करते हैं वहीं उत्तर भारतीय बड़े गर्व से बताते हैं कि ‘मेरे 5 साल के
बच्चे को हिन्दी नहीं आती|' छोटे शहरों से गये ये उत्तर-आधिनिक (Post
modern) मां-बाप अपने बच्चों से अंग्रेजी में ही बात करते हैं| विकसित
देशों पर लट्टु ये होनहार ये नहीं सोचते कि इन देशों में प्राथमिक शिक्षा
मातृभाषा में देने का प्रावधान क्यों है?
लोकतांत्रिक समाज
में सबसे आसान काम है सरकार को दोष देना। हिंदी की दुर्दशा के लिए भी हम ये ही
करते हैं। पर हिंदी सदा ही संघर्षशील भाषा रही। लड़ती रही, बढ़ती रही। हिंदी आज भी
बढ़ रही है पर अफसोस अपनों से उसे वो प्यार नहीं मिला जिसकी वो हकदार है।
- हिन्दी कल आज
और कल – प्रभाकर क्षोत्रीय - पृष्ठ सं. 13
- स्वराज्य का
अर्थ – माहत्मा गांधी – पृष्ठ
सं.36
- हिन्दी में हम- अभय दूबे- पृष्ठ
सं.45
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