Thursday, 22 October 2015

साहब के बिस्कुट



शायद आप कभी किसी सरकारी कार्यालय में गये हों। वहां बैठे बड़े साहब (आइ.ए.एस., आइ.पी.एस., आइ.एफ.एस. आदि)के कमरे के बाहर एक छोटा कमरा भी होता है। यह कमरा आकार में कुछ छोटा है पर ओहदे में उतना ही बड़ा होता है। अधिकतर इस कमरे में एक दो चपरासी, एक दरबान, एक निजी सचिव, एक ‘ब’ श्रेणी का काबिल अधिकारी जिसका काम साहब के पास आने- जाने वालों की स्क्रूटनी करना होता हैं, बैठते हैं। ऐसे ही एक कमरे का दृश्य देखिये : 


  छोटे कमरे का ओहदा इतना बड़ा था कि  उसमें 1 ए.सी., 2 कंप्यूटर, 12 ट्यूब लाइटें और 4 पंखे चलाकर एक गंभीर मुद्दे पर चर्चा हो रही है। 


मुद्दा यह है कि साहब को चाय के साथ दिये जाने वाले साहब के पसन्दीदा बिस्कुट केवल 4 ही हैं। एक बिस्कुट साहब की प्लेट में रखा जाना है। अब समस्या ये है बचे हुए यह 3 कीमती बिस्कुट अन्दर बैठे श्रेणी ‘ब’ के चार अधिकारियों में कैसे वितरित किये जायें। साहब की निजी सचिव परेशान हैं कि अगर कोई और बिस्कुट अंदर ले जाये गये तो साहब भड़क जायेंगें। साहब की दरियादिली यह है कि वह श्रेणी ‘ब’ के अधिकारियों को भी वह अपनी ताईं मौज करना चाहते हैं। अब अगर तीन अधिकारियों को एक जैसे बिस्कुट मिलें और एक कोई रह गया तो यह मुद्दा सहाब के कमरे से बाहर आते ही आत्मसम्मान और स्वाभीमान का प्रश्न बन जायेगा। यदि गलती से साहब ने यह बदइंतज़ामी देख ली तो ‘शिष्टाचार और प्रबंधन’ का वो काड़ा पिलायेंगें कि एक हफ्ते तक पेट में मरोड़ पड़ता रहेगा।


तभी इस कमरे में बैठे एक दरबान और दो चपरासियों में से एक ने सचिव मैडम को याद दिलाया कि उसने कल अलमारी बन्द करते समय गिने थे तो 6 बिस्कुट थे। फिर दो कहां गये?  इस कमरे में बैठे एक श्रेणी ‘ब’ अधिकारी मि. नैथानी ने अपनी कार्यक्षमता का उत्क़ृष्ट नमूना पेश किया और अपनी धीर-गंभीर अवाज़ में बोले ‘अबे वो मेहता तो नहीं खा गया। उसकी प्रमोशन तो दो साल बाद है लेकिन वो साहब की सभी चीज़ों को अपने बाप का माल समझता है।’ 


(ये महेता जी दो साल बाद प्रोन्नति पाकर साहब हो जायेंगे)  


‘अरे नैथानी जी मैं तो सहाब को बता दूंगी कि महेता बिस्कुट खाता है आपके।’ निजी सचिव ने हाथ मचकाते हुए कहा।


मैडम उसे देता कौन है? हमारे बीच से ही कोई है।– ऐसा कहते हुए वे सी.आई.डी. के इंस्पैक्टर प्रद्युम्न की तरह दिख रहे थे।


‘अरे साहब चाय ठंडी हो रही है ..... क्या करूं?’ दूसरा चपरासी बोला

‘मंगवाने का समय नहीं हैं’ 

‘डांट खाने का मेरा मन नहीं है’ मैडम ने नैथानी की बात को बीच में ही काटा।
साहब की घंटी दुबारा बजी। मैडम लगभग काँप गयीं फिर संभली और चपरासियों को देख कर गुर्राईं  ‘मर जाओ कहीं जाके निक्क्मो। बिस्कुट तक नहीं संभाल सकते।’
‘अरे अंदर तो जाओ मैडम!!!’

आप चले जाओ

मैं फाइल देख रहा हूँ।

ओ हो!!! कोई बात नहीं नैथानी जी आप का भी समय आयेगा....................

(मैडम ने मन ही मन कहा)



यह तो लेखक को नहीं पता की बाद में साहब ने किस-किसको क्या-क्या कहा पर इतना वह समझ गया कि एक अच्छा कर्मचारी बनने के लिये किन-किन बातों पर ध्यान दिया जान चाहिए।  

  

     


 

4 comments:

  1. अच्छा प्रयास है ! भाषा की गलतियों से बचें . वैसे विषय बढ़िया चुना है . लगे रहिये .

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    1. धन्यवाद अंजुम जी. आप प्रोत्साहित करते रहिए हम लगे रहेंगे.

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  2. बंधू आपके इस विषय की झलक अक्सर देखने को मिल जाती है
    किसी भी सरकारी दफ्तर में आप ऐसे नज़ारे प्रायः देख सकते है
    अति सुन्दर भाई
    लगे रहिये

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    1. शुक्रिया. बस यह ही सोचना है कि बदलाव कैसे हो

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