उजास की तलाश है – 'मनुष्यता का पक्ष'
एक ऐसे समय में जब विश्व भर में कट्टरता और अधिक विद्रूप होती जा रही है, जब राष्ट्रवाद एक वीभत्स नस्लवाद का रूप ले चुका है, जब धर्म हिंसक उन्माद बनकर युवा नसों में विष घोल रहा है, जब किसी सरहद पर खड़े शरणार्थी देश में घुसने के लिए मरने तक को तैयार हैं, जब व्यवस्था किसान की ओर मुंह करके सो रही है और किसानों की आत्महत्या मीडिया के लिए महज एक संख्या बनकर रह गई है तब मनुष्यता की बात करना उन सब के हक की बात करना है जिनकी आवाज़ गले में ही घोंट दी गई है|
लेखक ने पुस्तक को तीन भागों में बांटा है जिसके सहारे वह साहित्य से लेकर रंगमंच और फिल्मों तक से मानवीय पक्ष में लामबंद मनीषियों की रचनाओं और कृतियों में बिंधे विचारों को परत दर परत खोलता है| भवानी प्रसाद मिश्र की जन्मशती पर उनके काव्य का पुनर्पाठ करते हुए लेखक उनकी कविताओं को गांधीवादी चश्मा हटाकर देखने का प्रयास करता है| ‘गीत-फरोश’ या ‘सतपुडा के घने जंगल’ के कवि की ‘मरे नहीं लड़ाई में’, ‘हम दुनिया के सत्ताधारियों को’, ‘शस्त्र बनाने वालों’, ‘युद्ध का नाम जुबान पर मत आने दो’, ‘युद्ध की वकालत में’ जैसी कविताओं को चिन्हित कर उन्हें गुंटर ग्रास या नाजिम हिकमत के समानांतर रखकर देखने का पक्षधर है| लेखक भवानी प्रसाद मिश्र के जन्मशती वर्ष में विश्व शांति की तलाश में उसका सहयोगी बन जाता है तो ‘बलदेव खटीक’ की पीड़ा को भी जीता है और वहां छिपी उजास की बारीक रेखा को भी रेखांकित करता है , "उजास की तलाश लीलाधर जगूड़ी का मूल प्रश्न रहा है किंतु जब समय अंधेरों के घटाटोप में घिरी दोपहर का हो, तब कविता की भूमिका बड़ी हो जाती है वह बुनियादी सवालों से टकराए एवं प्रतिरोध विहीन समय में प्रतिरोध एवं हस्तक्षेप की निर्मिति करें ।"
लेखक ने पुस्तक को तीन भागों में बांटा है जिसके सहारे वह साहित्य से लेकर रंगमंच और फिल्मों तक से मानवीय पक्ष में लामबंद मनीषियों की रचनाओं और कृतियों में बिंधे विचारों को परत दर परत खोलता है| भवानी प्रसाद मिश्र की जन्मशती पर उनके काव्य का पुनर्पाठ करते हुए लेखक उनकी कविताओं को गांधीवादी चश्मा हटाकर देखने का प्रयास करता है| ‘गीत-फरोश’ या ‘सतपुडा के घने जंगल’ के कवि की ‘मरे नहीं लड़ाई में’, ‘हम दुनिया के सत्ताधारियों को’, ‘शस्त्र बनाने वालों’, ‘युद्ध का नाम जुबान पर मत आने दो’, ‘युद्ध की वकालत में’ जैसी कविताओं को चिन्हित कर उन्हें गुंटर ग्रास या नाजिम हिकमत के समानांतर रखकर देखने का पक्षधर है| लेखक भवानी प्रसाद मिश्र के जन्मशती वर्ष में विश्व शांति की तलाश में उसका सहयोगी बन जाता है तो ‘बलदेव खटीक’ की पीड़ा को भी जीता है और वहां छिपी उजास की बारीक रेखा को भी रेखांकित करता है , "उजास की तलाश लीलाधर जगूड़ी का मूल प्रश्न रहा है किंतु जब समय अंधेरों के घटाटोप में घिरी दोपहर का हो, तब कविता की भूमिका बड़ी हो जाती है वह बुनियादी सवालों से टकराए एवं प्रतिरोध विहीन समय में प्रतिरोध एवं हस्तक्षेप की निर्मिति करें ।"
लेखक की समीक्षा गल्प, आख्यान एवं फैंटसी के शिल्प में मोती की तरह छिपी संवेदना का विस्तार से सरलीकरण करती चलती है| लेखक ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ के स्रष्टा वीरेन डंगवाल की प्रतिबद्धताओं को उकेरता है| राजेश जोशी की ‘जादूगरनी’ ‘प्रजापति’ ‘मारे जाएंगे’ ‘नेपथ्य में हंसी’ ‘भरोसे की डोर’ ‘घबराहट’ कविताओं के जरिए राजेश जोशी की सृष्टि-दृष्टि को ‘बारूद की गंध’ में ‘उम्मीद स्वप्न और आकांक्षा’ का कवि माना गया है| ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ जैसी सरल, मार्मिक और चुटीली कविता लिखने वाले राजेश जोशी का कृतित्व ही साम्राज्यवादी और वितंडतावादी ताकतों से टकराकर सर्वहारा के लिए न्याय की मांग करता है| इतिहास जिन त्रासदियों का साक्षी रहा है वही त्रासदियां रूप बदलकर फिर खड़ी हो जाती है क्योंकि सत्ता इतिहास से नहीं स्वार्थ से चालित होती है| यूरोप में प्रवेश के लिए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते शरणार्थी हों या समुद्री रेत पर लहरों में बहता एलन कुर्दी हो या भारत विभाजन के दौरान हुई बर्बरता, शरणार्थी सत्ता के आगे घुटनों पर बैठा ही नजर आता है| राष्ट्र किसी मनुष्य से कहीं अधिक स्वार्थी होता है| भीष्म साहनी के कथा साहित्य की मूल चेतना बन चुकी इस पीड़ा को विपिन इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं
“भीष्म साहनी की कहानी के अंत:करण पर बात की जाए तो देश विभाजन के आसपास उभर रहे फिराकपरस्ती के परिवेश एवं निजी धार्मिक पहचानों को लेकर बढ़ती कट्टरता की प्रवृत्ति का उनकी कहानी पर्दाफाश करती है। फिजाओं में तैर रहे अलगाव को बहुत दूर से पहचान लेने की क्षमता ही उन्हें विशिष्ट रचनाकार बनाती है|”
गुलजार की लिखी फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ में इसी सब्जेक्ट के ट्रीटमेंट को किस कदर भावातिरेक से जोड़ा गया है इसकी तस्वीर भी किताब में आगे स्पष्ट हो जाती है।
“भीष्म साहनी की कहानी के अंत:करण पर बात की जाए तो देश विभाजन के आसपास उभर रहे फिराकपरस्ती के परिवेश एवं निजी धार्मिक पहचानों को लेकर बढ़ती कट्टरता की प्रवृत्ति का उनकी कहानी पर्दाफाश करती है। फिजाओं में तैर रहे अलगाव को बहुत दूर से पहचान लेने की क्षमता ही उन्हें विशिष्ट रचनाकार बनाती है|”
गुलजार की लिखी फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ में इसी सब्जेक्ट के ट्रीटमेंट को किस कदर भावातिरेक से जोड़ा गया है इसकी तस्वीर भी किताब में आगे स्पष्ट हो जाती है।
पुस्तक के दूसरे खंड के लिए लेखक ने नोबेल विजेता विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों को चुना है| मार्खेज और गुंटर ग्रास द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि से उपजे संत्रास, नीरवता और ग्लानि बोध के स्वर हैं|
परवीन शाकिर और इजाडोरा इस विमर्श में स्त्री जगत की पीड़ा को अलग ढंग से चित्रित करती हैं| अपनी प्रेम-कविताओं के लिए प्रसिद्ध पाब्लो नेरुदा का इस खंड के लिए चयन कुछ हैरान करता है परंतु नेरुदा को पढ़ना या उनके बारे में परिणाम हमेशा दिलचस्प रहता है|
यहां लेखक केवल साहित्यकारों की आलोच्य कृतियों की विषय-वस्तु तक ही सीमित नहीं रहता, वह उस विषय-वस्तु में गुंथे परिवेश को पकड़ता है, उस समाज के इतिहास और वर्तमान में उतर कर वहां की चेतना और समस्याओं को भी पाठकों के सामने रखता है| हिंदी पाठकों के लिए विस्सावा शिम्बोर्स्का और हंगरी लैजलो क्रैसना होर्काई को पढ़ना सम्भवत: नया अनुभव होगा| अहमद फराज और आज के दौर में खालिद हुसैनी हमारे अपने से ही हैं| अफगानिस्तान के उपन्यासकार, खालिद हुसैनी का उपन्यास ‘दी काईट रनर’ महाकाव्यात्मक विस्तार लिए हुए हर अफगानिस्तानी की वेदनाओं की चीत्कार है जो तालिबान से छुटकारा पाना चाहता रहा परन्तु अमरीकी आक्रमण में वह ही जख्मी हो रहा है, उसी का गाँव जलाया जा रहा है, उसी का कच्चे मकान जमीन पर बिखरा हुआ है| बाद के वर्षों में खालिद हुसैनी अमेरिका जा बसे| उनकी बदली हुई प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करने में विपिन जरा देर नहीं करते|
‘यहाँ पर एक सवाल यह भी उठाता है लियोनेद ब्रेजनेव और रोनाल्ड रीगन के प्रसंगों के माध्यम से खालिद हुसैनी अमेरिका को देवदूत के रूप में प्रस्तुत करते मगर जो अमेरिका ने तालिबान के सफाए के नाम पर किया, वह भी उतना ही जघन्य अपराध है|’
लम्बे समय से फिल्मों की गम्भीर समीक्षा कर रहे विपिन की ललित कला की समझ प्रभावित करती है| ‘रंग में देखती’ और ‘खुशबू में सोचती’ अमृता शेरगिल का निधन 1941 में हुआ लेकिन उनकी कलाकृतियाँ और उनकी बेबाक जीवन-शैली पितृसतात्मक समाज से विद्रोह करती रही|
पुस्तक के अनेक लेख प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं| वैश्विक साहित्य को जिस अंतर्दृष्टि से पकड़ा गया है वह हिंदी पाठकों के लिए असाधारण है| शीर्षकों में विपिन की रचनात्मकता दिखती है| कुल मिलाकर चबा-चबाकर पढने वाली पुस्तक..|
परवीन शाकिर और इजाडोरा इस विमर्श में स्त्री जगत की पीड़ा को अलग ढंग से चित्रित करती हैं| अपनी प्रेम-कविताओं के लिए प्रसिद्ध पाब्लो नेरुदा का इस खंड के लिए चयन कुछ हैरान करता है परंतु नेरुदा को पढ़ना या उनके बारे में परिणाम हमेशा दिलचस्प रहता है|
यहां लेखक केवल साहित्यकारों की आलोच्य कृतियों की विषय-वस्तु तक ही सीमित नहीं रहता, वह उस विषय-वस्तु में गुंथे परिवेश को पकड़ता है, उस समाज के इतिहास और वर्तमान में उतर कर वहां की चेतना और समस्याओं को भी पाठकों के सामने रखता है| हिंदी पाठकों के लिए विस्सावा शिम्बोर्स्का और हंगरी लैजलो क्रैसना होर्काई को पढ़ना सम्भवत: नया अनुभव होगा| अहमद फराज और आज के दौर में खालिद हुसैनी हमारे अपने से ही हैं| अफगानिस्तान के उपन्यासकार, खालिद हुसैनी का उपन्यास ‘दी काईट रनर’ महाकाव्यात्मक विस्तार लिए हुए हर अफगानिस्तानी की वेदनाओं की चीत्कार है जो तालिबान से छुटकारा पाना चाहता रहा परन्तु अमरीकी आक्रमण में वह ही जख्मी हो रहा है, उसी का गाँव जलाया जा रहा है, उसी का कच्चे मकान जमीन पर बिखरा हुआ है| बाद के वर्षों में खालिद हुसैनी अमेरिका जा बसे| उनकी बदली हुई प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करने में विपिन जरा देर नहीं करते|
‘यहाँ पर एक सवाल यह भी उठाता है लियोनेद ब्रेजनेव और रोनाल्ड रीगन के प्रसंगों के माध्यम से खालिद हुसैनी अमेरिका को देवदूत के रूप में प्रस्तुत करते मगर जो अमेरिका ने तालिबान के सफाए के नाम पर किया, वह भी उतना ही जघन्य अपराध है|’
लम्बे समय से फिल्मों की गम्भीर समीक्षा कर रहे विपिन की ललित कला की समझ प्रभावित करती है| ‘रंग में देखती’ और ‘खुशबू में सोचती’ अमृता शेरगिल का निधन 1941 में हुआ लेकिन उनकी कलाकृतियाँ और उनकी बेबाक जीवन-शैली पितृसतात्मक समाज से विद्रोह करती रही|
पुस्तक के अनेक लेख प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं| वैश्विक साहित्य को जिस अंतर्दृष्टि से पकड़ा गया है वह हिंदी पाठकों के लिए असाधारण है| शीर्षकों में विपिन की रचनात्मकता दिखती है| कुल मिलाकर चबा-चबाकर पढने वाली पुस्तक..|
(दैनिक जनवाणी में 14 जनवरी को प्रकाशित।साभार)
सरल हिंदी क्यूँ नहीं लिखते?
ReplyDeleteक्या किसी अंग्रेजी वाले को कहा जायेगा सरल अंग्रेजी क्यों नहीं लिखते। पोस्ट की भाषा-शैली विषयवस्तु के अनुसार है। सभी पोस्ट में यह अंतर देखा जा सकता है।
Deleteअपने में तमाम अद्यतन घटनाओं को समेटते हुए एक सधे हुए वाक्य से समीक्षा का आरंभ आपकी समीक्षक दृष्टि का परिचायक है राजेश भाई. समीक्षा आपकी साहित्यिक ऊँचाई से भी अवगत कराती है. निश्चित ही पुस्तक मानस को झकझोरने और विचारने को विवश करने वाली होगी.
ReplyDeleteबहुत ही बढ़िया समीक्षा राजेश भाई.
विपिन सर को नमस्कार.
शुक्रिया नेत्रपाल जी।
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